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‘नेपाल के कम्युनिस्टों में वामपंथी चरित्र ही नहीं है’

नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव के बाद बेहद छोटे हो गए हैं और पार्टी के पुनर्गठन, नेतृत्व की समीक्षा और बदलाव के मुद्दों पर व्यापक चर्चा हो रही है। डॉ. खगेन्द्र प्रसाईं ने कम्युनिस्टों की चुनाव हार को समाजवादी अभियान के संकट की स्थिति नहीं कहा है। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टियों में व्यक्तिगत स्वार्थ और नवउदारवादी प्रवृत्तियों के कारण आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होने का उल्लेख किया है।

प्रतिनिधि सभा चुनाव के बाद नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टी बहुत छोटे हो गए हैं। वर्तमान में उनके बीच पार्टी पुनर्गठन, नेतृत्व समीक्षा और बदलाव के विषय में गहन चर्चा चल रही है। कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के ७७वें वर्ष के संदर्भ में एकता का मुद्दा भी सामने आ रहा है। इसी संदर्भ में डॉ. खगेन्द्र प्रसाईं ने कहा, “पिछले १०–१५ वर्षों से नेपाल के मुख्य कहे जाने वाले कम्युनिस्ट पार्टी वास्तव में समाजवादी अभियान या आन्दोलन का नेतृत्व नहीं कर रहे थे।”

उन्होंने आगे कहा, “पिछले चुनाव से नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टी बहुत छोटे हो गए हैं।” उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की संसदीय स्थिति और वामपंथी आन्दोलन की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “हमारे संविधान में ‘समाजवाद’ अंकित है और चुनाव जीतने-हारने वाले सभी दलों की दस्तावेजों में समाजवाद का उल्लेख है।”

डॉ. प्रसाईं ने कहा, “पूंजीवाद और नवउदारवाद व्यक्ति को केंद्र में रखते हैं और समूह या समाज को गौण मानते हैं।” उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यशैली में नज़र आने वाली मुख्य समस्याओं और कमजोरियों पर भी बातचीत की। उन्होंने जोड़ा, “पार्टी एकीकरण क्यों होता है या फिर क्यों टूटता है? इसके पीछे मुख्य कारण व्यक्तिगत स्वार्थ ही होता है।”

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