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सुधारका संकेत, हतारका निर्णय – Online Khabar

रास्वपा सरकार में सुधार के संकेत और जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों का मेल

समाचार सारांश

  • राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी के वरिष्ठ नेता बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने पहले महीने में सभी दलों के चुनावी घोषणापत्रों को समेटकर राष्ट्रीय प्रतिबद्धता तैयार करने का संकल्प लिया है।
  • सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी तथा निजी अस्पतालों में 10 प्रतिशत शैयाएँ गरीब और बेसहारा मरीजों को नि:शुल्क उपलब्ध कराने का निर्णय कड़ाई से लागू करने का आश्वासन दिया है।
  • सरकार ने सुकुमवासी बस्तियों को हटाने का निर्णय लिया है तथा भूमिहीनों के प्रमाणीकरण और जमीन उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन इसका प्रक्रिया विवादित बनी हुई है।

१३ वैशाख, काठमांडू। राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के वरिष्ठ नेता बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में बने सरकार ने अपने पहले महीने में कुछ सकारात्मक संकेत दिखाए हैं। इसका एक उदाहरण है– राष्ट्रीय प्रतिबद्धता में सभी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्रों के सकारात्मक पहलुओं को शामिल करने का संकल्प।

सरकार गठन के दिन १३ चैत को मंत्रिपरिषद ने स्वीकृत किए गए शासकीय सुधारों की १०० बुँदियों में तीसरे बिंदु में यह उल्लेख था कि चुनाव में भाग लेने वाले सभी दलों के घोषणापत्र, वाचापत्र तथा प्रतिबद्धतापत्र को शामिल कर ‘राष्ट्रीय प्रतिबद्धता’ तैयार की जाएगी तथा सरकार इसका मालिकाना हक रखेगी।

सरकार ने ‘राष्ट्रीय प्रतिबद्धता’ का मसौदा तैयार कर लिया है। इसके क्रियान्वयन या न होने का फैसला समय के साथ स्पष्ट होगा, लेकिन यह एक अच्छी शुरुआत है। प्राचीन ग्रीक दार्शनिक अरस्तू के अनुसार, अच्छी शुरुआत आधे काम के बराबर होती है।

एक गठबंधन सरकार में भी वैचारिक मतभेदों के बावजूद सत्ता भागीदारों द्वारा प्रस्तुत अच्छे नीति-कार्यक्रमों की आलोचना करने की प्रवृत्ति होती है, लेकिन बालेन्द्र शाह नेतृत्व वाली सरकार ने इसका सही उदाहरण पेश किया है जिसे सराहना मिलनी चाहिए।

यह निर्णय यह संकेत देता है कि सरकार केवल विरोध के लिए विरोध करने की पुरानी प्रवृत्ति से बाहर निकल रही है। यह सोच महत्वपूर्ण है और भविष्य की सरकारें भी विपक्ष के सकारात्मक पहलुओं को स्वीकार करने की संस्कृति विकसित करेंगी।

लगभग दो तिहाई मत हासिल करने वाले रास्वपा के प्रारंभिक संकेत सकारात्मक हैं, ऐसा पूर्व सचिव शारदाप्रसाद त्रिताल कहते हैं। वे कहते हैं, ‘इस सरकार का पहले महीने में किया गया काम पिछली सरकारों से भिन्न है। पिछली सरकारें केवल मुलाकात और अनावश्यक खर्चों में व्यस्त रहती थीं, यह सरकार आशा का संदेश दे रही है।’

शासकीय सुधार, सुशासन और सेवा प्रवाह में सरकार की प्रतिबद्धता के कारण अच्छे संकेत दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री शाह सिंहदरबार कार्यालय से शासन चला रहे हैं और बालुवाटार के बजाय मंत्री परिषद कार्यालय को सक्रिय बनाए रखा है।

मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों ने भी अनावश्यक मुलाकातों और उद्घाटन समारोहों को कम किया है। सेवाग्राही अंततः सुधार महसूस करने लगे हैं।

प्रधानमंत्री शाह द्वारा विदेशी दूतावास प्रमुखों के साथ सामूहिक चर्चा को सकारात्मक रूप में देखा गया है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने स्पष्ट किया है कि सरकार बदलने पर भी विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं होगा।

हालांकि सरकार के प्रतिबद्धतापत्र में बफर स्टेट से सम्बंधित विषय की आलोचना हुई है। मेयर रहते हुए नेपाल में पारदर्शी छात्रवृत्ति प्रणाली लागू करने वाले शाह ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी समान निर्णय लिए। सरकारी और निजी अस्पतालों में 10 प्रतिशत शैयाओं पर गरीब और असहाय मरीजों को नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने का निर्णय व्यापक तौर पर सराहा गया है।

नेपाल में स्वास्थ्य सेवाओं की असुविधा के कारण यह व्यवस्था आवश्यक मानी जाती है, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है।

जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. रिता थापा ने निजी अस्पताल में 10 प्रतिशत नि:शुल्क शैयाओं का पारदर्शी प्रावधान और सरकारी अस्पतालों में गरीबों के लिए पूर्ण नि:शुल्क उपचार की व्यवस्था करने का सुझाव दिया है। वे स्वास्थ्य बीमा को प्रभावशील बनाने की भी बात करती हैं।

ऑक्सफेम इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में सबसे धनी 1 प्रतिशत लोग गरीब 50 प्रतिशत से 519 गुना अधिक संपत्ति के मालिक हैं।

सरकार ने सार्वजनिक पदों पर नियुक्त मुख्य राजनीतिक पदाधिकारी और उच्च स्तरीय अधिकारियों की संपत्ति विवरण संग्रहीत और जांच के लिए संपत्ति जाँच आयोग का गठन किया है। यदि आयोग निष्पक्ष और प्रभावी जांच करता है तो यह सुशासन के लिए बड़ा कदम होगा।

मालपोत, पासपोर्ट विभाग, जिला प्रशासन कार्यालय आदि भीड़भाड़ वाले कार्यालयों में मध्यस्थों को रोककर सेवा चुस्त बनाने का प्रयास सकारात्मक है, हालांकि इसका स्थायित्व समय ही बताएगा।

रास्वपा ने दलीयकरण और सिंडिकेट को समाप्त करने का भी प्रयास दिखाया है। यह चुनौती भी दी है कि नागरिक होने के बावजूद कोई दल सदस्य न हो।

कर्मचारी यूनियन और विद्यार्थी संगठन खत्म करने के निर्णय को मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है। सुकुमवासी बस्तियों को हटाने का निर्णय भी विवादित है। मानव अधिकारों और संवैधानिक दृष्टिकोण से आलोचना के बावजूद कानूनी अधिकार और कार्यकारी निर्णय के तहत इसे स्वीकार भी किया गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता राजुप्रसाद चापागाईं बस्ती हटाने की प्रक्रिया में अनुसंधान और प्रमाणीकरण के चरणों को लेकर असंतुष्ट हैं। वे कहते हैं, ‘पहले हटाना और बाद में प्रमाणीकरण करना दंड प्रक्रिया जैसा लग रहा है।’

सुकुमवासी समस्या नया नहीं है, इसे संविधान और कानूनी प्रावधानों के अनुसार हल किया जा सकता है। भूमिहीन दलित और सुकुमवासियों को जमीन उपलब्ध कराने के लिए कानूनी स्पष्टता भी मौजूद है।

फिर भी भूमिहीनों का कहना है कि सरकार ने उनका मानवीय दृष्टिकोण नहीं रखा। संयुक्त राष्ट्रिय सुकुमवासी मोर्चा के उपाध्यक्ष पवन गुरुङ बस्ती हटाने की प्रक्रिया अधूरी और त्रुटिपूर्ण बताते हैं। उनका आरोप है कि पुलिस द्वारा बिना वार्तालाप तत्काल कार्रवाई करना मानवीय नहीं है।

गुरुङ बताते हैं, ‘सुकुमवासियों को प्रमाणीकरण के बाद ही उचित स्थानान्तरण करना चाहिए था, तब यह कदम स्वागत योग्य होता।’

सरकार सबका अभिभावक होने के नाते उसके कार्य वैधता और मान्यता प्राप्त होने चाहिए। ब्रिटिश प्रधान न्यायाधीश लॉर्ड हेवर्ट के अनुसार न्याय सिर्फ दिया नहीं जाता, बल्कि न्याय दिया हुआ दिखाना भी जरूरी है।

फिर भी सरकार की जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों ने वैधता और स्वीकार्यता पर सवाल उठाए हैं।

अध्यक्ष रामचंद्र श्रेष्ठ ने कहा है कि सरकार सक्रिय है, लेकिन इसका स्पष्ट उद्देश्य अस्पष्ट है। बुटवल में कार्यरत वे कहते हैं, ‘सरकार कार्रवाई उन्मुख है, लेकिन संवाद और संसद से स्वीकार्यता के अभाव में दिशा उलझी हुई है।’

संविधानविद् डॉ. विपिन अधिकारी ने सुकुमवासी मुद्दे पर सरकार की अच्छी शुरुआत बताई। वे मानते हैं कि कुछ समस्याएं हैं, लेकिन आवश्यक काम हो रहा है।

सरकार ने शासकीय सुधार की १०० बिंदुओं के तहत दो महीने में लागत जमा और प्रमाणीकरण, तथा १००० दिनों में जमीन उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई थी। ऐसा काम जारी है।

हालांकि कुछ कार्य जल्दबाजी और अधूरा दिख रहा है, डॉ. अधिकारी ने बताया। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखा समेत कुछ की गिरफ्तारी में कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।

उन्होंने कहा, ‘पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व गृह मंत्री की गिरफ्तारी गैरकानूनी है।’

सरकार की नियत गलत नहीं हो सकती, लेकिन संविधान और कानून के पालन में कमी है, ऐसा विभिन्न सरोकारधारक बताते हैं। संघीय सरकार द्वारा संविधान के तहत प्रदेश और स्थानीय सरकारों के अधिकारों को चुनौती देने वाला फरमान जारी होना विवादास्पद रहा।

सभी आधारभूत और माध्यमिक शिक्षा के अधिकार स्थानीय सरकारों को देने का प्रावधान संविधान की अनुसूची-८ में है। संघीय सरकार द्वारा स्कूल कब खोलने और कितने दिन चलाने जैसे निर्देश देने पर स्कूल संघ और राष्ट्रीय गाउँपालिका महासंघ ने विरोध किया था।

सरकार ने वैशाख २१ के बाद ही स्कूल खोलने का कहा, लेकिन अधिकांश स्कूल पहले ही संचालन में आ गए हैं।

सरकार की अपरिपक्वता संसद अधिवेशन बुलाने के समय भी दिखी। वैशाख ८ को राष्ट्रपति को सिफारिश करके ९ तारीख को अधिवेशन शुरू किया गया, लेकिन अगले ही दिन स्थगित करने की सिफारिश आई।

विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय अनुचित और संसद को दरकिनार कर अध्यादेश लाने की पुरानी परंपरा का पुनरावृत्ति है। दो तिहाई बहुमत होने के बावजूद ऐसी उम्मीद नहीं थी।

एक महीना भी नहीं पूरा हुए दो मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। गृह मंत्री सुधन गुरुङ और श्रम मंत्री दीपक साह के बाहर होने के बाद सरकार की सहनशीलता कमजोर नजर आई। यह गलत व्यक्तियों के चयन का परिणाम भी माना जा रहा है।

संविधान संशोधन बहस पत्र के लिए कार्यदल का गठन किया गया है। पहले संवैधानिक आयोग महानुभावों द्वारा बनाए जाते थे, लेकिन इस बार इसे प्रशासनिक बनाया गया है जिससे आलोचना हुई।

संविधानविद् डॉ. विपिन अधिकारी ने प्रारंभिक मसौदे के लिए कार्यदल को सकारात्मक दृष्टिकोण से लेने का सुझाव दिया है।

राजनीतिक अस्थिरता के बीच बने इस सरकार ने जनता से बड़ी उम्मीद और भरोसा पाया है, सामाजिक विज्ञानी अजय यादव कहते हैं। जनकपुर के रामसवरूप रामसागर बहुमुखी कॉलेज में पढ़ाने वाले यादव कहते हैं, ‘लोग निराश होकर एक व्यक्ति में उम्मीद लगाकर मतदान करते हैं। इसलिए आकांक्षाएं अधिक हैं और अब तक का काम अच्छा लग रहा है। जोश अधिक है और समझ कम, इसे संतुलित करना आवश्यक है।’

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