
हिरासत में हुई मौतों में ७२% हाशिए पर रह रहे समुदाय के सदस्य, क्या यह राज्य की चुप्पी है या संरचनागत अपराध?
समाचार सारांश
समीक्षित।
- नेपाल में हिरासत कक्ष में रहस्यमय तरीके से हुई ३९ मौतों में से ७२ प्रतिशत दलित और हाशिए पर रह रहे समुदायों के सदस्य हैं, जोकि संरचनागत हिंसा का परिणाम है।
- सिंधुली के श्रीकृष्ण विक की हिरासत में हुई मौत के बाद उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की गई है और राष्ट्रीय दलित आयोग ने इसे गृह मंत्रालय व पुलिस में प्राथमिकता दी है।
- हिरासत में हुई मौतों की जांच रिपोर्टें गोपनीय रखी जाने से दोषी न निकलने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे न्याय प्रणाली में दण्डहीनता साफ़ होती है।
नेपाल के संविधान में प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवित रहने का अधिकार दिया गया है। लेकिन हिरासत में लिए गए कई लोगों की ‘हिरासत कक्ष’ में रहस्यमय मौत होती है, जो राज्य की नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है। सिंधुली के सुनकोशी गाउँपालिका-३ के २३ वर्षीय श्रीकृष्ण विक इस संदर्भ में ताजा उदाहरण हैं।
पञ्चायतकाल में पुलिस हिरासत को कालकोठरी कहा जाता था। सामान्य पूछताछ के लिए लाए गए कई नागरिकों की जान गई। दश वर्षों तक चले राज्य-विरोधी संघर्ष के दौरान भी हिरासत कक्ष को कालकोठरी ही कहा जाता था। यह स्थिति आज भी बदली नहीं है।
इसी तरह, हिरासत में रहस्यमय मौतों वाले अधिकांश व्यक्ति दलित और हाशिए पर रह रहे समुदायों के हैं, जो राज्य में संरचनागत अपराध की गंभीर चिंता को दर्शाता है।
हाल की घटनाएं दिखाती हैं कि हिरासत में मौतें केवल तकनीकी दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक पूर्वाग्रह और संरचनागत हिंसा का परिणाम हैं। यहाँ पांच प्रमुख हिरासत मौतों का विवरण प्रस्तुत है:
‘सुरक्षा की सीमा में असुरक्षित मृतक’
१. श्रीकृष्ण विक (सिन्धुली, तिथि: २०८३ वैशाख ७):
सिन्धुली के सुनकोशी गाउँपालिका-३ के २३ वर्षीय श्रीकृष्ण विक, जो वाहन चालक थे, उन्होंने कथित तौर पर उच्च जाति की किशोरी से प्रेम विवाह २८ चैत्र २०८२ को किया। लेकिन किशोरी के परिवार ने उनकी कम उम्र को लेकर ‘जबरदस्ती करणी’ का मामला दर्ज कराया। उन्हें ललितपुर के सातदोबाटो से गिरफ्तार कर सिन्धुली के खुर्कोट पुलिस के हवाले किया गया। ४ वैशाख को उन्हें खुर्कोट हिरासत में ले जाया गया और ७ वैशाख शाम ६ बजे पुलिस ने उनकी आत्महत्या की सूचना दी।
श्रीकृष्ण की हत्या में ३ फीट चौड़े झ्याल से लटकने, शरीर पर चोटों और पुलिस द्वारा सीसीटीवी फुटेज दिखाने में देरी के कारण हिरासत में की गई ‘अनर किलिंग’ पर संदेह है।
२. विजयराम महरा (रौतहट, तिथि: २०७७ भदौ १०):
रौतहट के गरुडा के १९ वर्षीय विजयराम महरा को हत्या के मामले की पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया गया था। हिरासत में उनके दोनों गुर्दे काम करना छोड़ दिए। वीरगंज में इलाज के दौरान १० भदौ २०७७ को उनकी मृत्यु हो गई। मौत से पहले उन्होंने वीडियो संदेश में बताया कि पुलिस ने पाइप और बूट से यातना दी। पुलिस ने सबूत मिटाने की कोशिश की लेकिन दबाव आने पर कुछ पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला भी दर्ज हुआ।
३. शम्भु सदा मुसहर (धनुषा, तिथि: २०७७ जेठ २८):
धनुषा के सवैलास्थित इलाका पुलिस कार्यालय की हिरासत में २३ वर्षीय शम्भु सदा मुसहर को २८ जेठ २०७७ को मृत पाया गया। पुलिस ने उनका शव हिरासत के शौचालय में लटकाया हुआ बताया, लेकिन शव के लटकने की ऊंचाई और उनकी कद-काठी मेल नहीं खाते थे। यह आत्महत्या घटना मधेश में बड़े आंदोलन का कारण बनी। परिवार ने पुलिस यातना से हत्या होने का दावा किया लेकिन तथ्य कभी सार्वजनिक नहीं हुए।
४. राजकुमार चेपाङ (चितवन, तिथि: २०७७ साउन ७):
चितवन के राप्ती नगरपालिका के २४ वर्षीय राजकुमार चेपाङ की मृत्यु सुरक्षा कर्मियों द्वारा की गई क्रूरतापूर्ण पिटाई का परिणाम थी। उन्हें १ साउन को हिरासत में लिया गया था और ७ साउन को इलाज के दौरान मृत्यु हो गई। मानवअधिकार समर्थकों ने उन्हें यातना दिए जाने की रिपोर्ट दी थी।
५. पल्टु रविदास (धनुषा, तिथि: २०७८ साउन १५):
धनुषा के लक्ष्मीनियाँ गाउँपालिका-२ के ४० वर्षीय पल्टु रविदास की मृत्यु ने राज्य की संवेदनशीलता की कमी दिखाई। उन्हें हत्या के मामले में ११ साउन २०७८ को दो लाख रुपये की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया था। पैसे जुटाने में देरी के कारण वह हिरासत में थे। १५ साउन की सुबह उन्हें पुलिस हिरासत के शौचालय में लटका पाया गया। परिवार ने हत्या होने का दावा किया और शव स्वीकार करने से इनकार किया। जांच में पुलिस जवान को निलंबित किया गया लेकिन रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई और न्याय अभी तक नहीं मिला। यह घटना दर्शाती है कि हिरासत में जातीय अहंकार और पुलिस हिंसा निर्दोषों की जान ले रही है।
हिरासत में मौतों का तथ्यांक: ७२ प्रतिशत हाशिए पर रह रहे
एडवोकेसी फोरम द्वारा २०१८ से २०२२ तक एकत्रित ३९ हिरासत मौतों के आंकड़ों के अनुसार ७२ प्रतिशत मृतक दलित, जनजाति या मधेसी जैसे ऐतिहासिक रूप से पिछड़े समुदाय के सदस्य थे।
तालिका १: हिरासत में हुई मौतों के जातीय विवरण (२०१८-२०२२)
यह तालिका दर्शाती है कि अधिकांश मृतक हाशिए पर रहने वाले समुदायों के हैं।
तालिका २: मौत के स्थान और प्रकृति का विवरण
रिपोर्ट के अनुसार ३९ मौतों में से १६ पुलिस हिरासत या दबाव में मारे गए हैं। यह घटनाएं अक्सर शौचालय में लटकने जैसी स्थितियों में हुई हैं, जो जातीय और सामाजिक पहुंच से सीधे संबंधित हैं।

एडवोकेसी फोरम की “राइज ऑफ टॉर्चर इन २०१८” जैसी रिपोर्टें दर्शाती हैं कि हिरासत में होने वाली मौतें और यातना जातीय एवं वर्गीय आधार पर निर्देशित हैं।

जांच समिति का निष्कर्ष: दोषियों की रक्षा
हिरासत में मौत के बाद राज्य जांच समिति गठन करने से बचता है। अगर समिति बनती भी है तो वह दोषी को बचाने का हथियार बन जाती है।
एडवोकेसी फोरम की रिपोर्ट “कस्टोडियल डेथ्स इन नेपाल (२०२२)” बताती है कि जांच समितियां दोषी को बरी कर डालती हैं, जो न्याय व्यवस्था में दण्डहीनता की पुष्टि है।
आरोपी स्वयं जांचकर्ता: सामान्य न्याय सिद्धांत के अनुसार कोई अपना मामला खुद जांच नहीं कर सकता। लेकिन नेपाल में पुलिस अपनी ही घटनाओं की जांच करती है।
विजयराम महरा के मामले में पुलिस ने सबूत संग्रह करने से मना किया और सबूत मिटाने या झूठा प्रमाण तैयार करने में लगी रही।
निम्न स्तर के कर्मचारी दोषी, उच्च पदस्थ संरक्षण में: हिरासत में होने वाली हिंसा आमतौर पर उच्च अधिकारियों के आदेश या मौन सहमति से होती है। जिम्मेदार उच्च अधिकारी निलंबित या दंडित नहीं होते, जबकि तल्ला दर्जे के कर्मचारी ही शिकार बनते हैं।
उदाहरण १ (पल्टु रविदास): उनकी मृत्यु के बाद ड्यूटी पर तैनात ३० वर्षीय पुलिस जवान जयप्रकाश यादव को ६ महीने के लिए निलंबित किया गया, जबकि कमांडर और कार्यालय प्रमुखों को कोई कार्रवाई नहीं हुई।
उदाहरण २ (विजयराम महरा): परिवार ने एसपी रविराज खड्का, डीएसपी ज्ञानकुमार महतो, इंस्पेक्टर नवीनकुमार सिंह और सई वीरेन्द्र यादव के खिलाफ मामला दर्ज करवाया, लेकिन जांच में केवल कुछ निचले कर्मचारियों को निलंबित या स्थानांतरित किया गया, जो केवल जलती राख बचाने की कोशिश थी।
रिपोर्टें गोपनीय रखी जाती हैं: जांच समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक न होने से दण्डहीनता बढ़ती है। ये रिपोर्टें गृह मंत्रालय की अलमारी में पड़ी रहती हैं।
राजकुमार चेपाङ की हत्या मामले में मानव अधिकार आयोग की सिफारिश लागू नहीं हुई। मध्यप्रदेश सरकार की दलित मौत जांच समिति भी ‘कोविड-१९’ के नाम पर कागजों तक सीमित रह गई।
मुकदमा दर्ज करने में अड़चनें: पुलिस के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाना मुश्किल होता है। शम्भु सदा मुसहर के मामले में इन्स्पेक्टर चन्द्रभूषण यादव के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं हो सकी। इसके बाद भी महान्यायाधिकरण ने ‘मुकदमा न चलाने’ का निर्णय किया, जो पुलिस की दण्डहीनता को बढ़ावा देता है।
अधिकारकर्मियों का मानना है कि पुलिस अपनी ही विरुद्ध मामलों की शिकायत नहीं लेती और उच्च अधिकारियों को जांच से बाहर रखती है, जिससे दण्डहीनता संस्थागत होती है। इससे उच्च अधिकारी दुरुपयोग करते हैं और निचले अफसर डरते हैं।
राष्ट्रीय दलित आयोग और मानव अधिकार आयोग की सिफारिशों को न मानना राज्य की भूमिका को संदिग्ध बनाता है और दलितों की हिरासत मौतों को बढ़ावा देता है।
‘रोस्टम पर माफी, हिरासत में हथकड़ी’:
प्रेम और विवाह जैसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता जातीय अहंकार के चलते कैसे संरचनागत हिंसा बन जाती है।
२०७८ चैत १३ की मंत्रिपरिषद की बैठक में दलित और हाशिए पर रहे समुदाय के अन्याय को स्वीकार करते हुए सुधार के लिए तत्काल कदम उठाने का निर्णय लिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार नियम लागू करने से पहले ही श्रीकृष्ण विक की रहस्यमय मौत ने सरकारी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़ा किया।
श्रीकृष्ण की मौत से एक महीने पहले राजपाले दलितों से बार-बार माफी मांगते हुए जातीय अन्याय समाप्त करने की घोषणा की थी, लेकिन कुछ दिनों में ही श्रीकृष्ण की प्रेम विवाह गिर गई और उन्हें हिरासत में मरना पड़ा। दलितों से माफी मांगने वाले दलों ने इस मामले पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी।
देश के सभी राजनीतिक दलों ने भी इस घटना को औपचारिक रूप से संबोधित नहीं किया। जातीय हिंसा की समस्या को केवल ‘दलित मुद्दा’ तक सीमित रखने की प्रवृत्ति है। श्रीकृष्ण की मौत और जांच रिपोर्ट ने राज्य की संरचनागत मानसिकता को प्रकट किया है। जब तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती और दोषियों को सजा नहीं मिलती, न्याय के नारे दलितों को धोखा देने के लिए ही रह जाएंगे।
अंतरजातीय प्रेम: किसी के लिए मौत, किसी के लिए कैद
नेपाली समाज में दलित होने का दर्द गहरा और अमानवीय है। सप्तरी की ज्योति पासवान और सर्लाही की १९ वर्षीय युवती के मामले दिखाते हैं कि कानून ने जातीय भेदभाव को खत्म किया है, लेकिन सामाजिक व्यवहार में मध्ययुगीन अमानवीयता अभी भी जीती है।
ज्योति पासवान ने २०७७ फागुन में कृष्ण मिश्रा से प्रेम विवाह किया, लेकिन परिवार ने जाति न मिलने के कारण दबाव बनाया और कृष्ण ने उनसे संपर्क तोड़ लिया। असहनीय तिरस्कार के कारण २०७८ साउन में उन्होंने आत्महत्या कर ली।
सर्लाही में एक दलित युवती को विवाह का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण किया गया और बाद में ‘अछूत’ कहा-कर २३ दिन तक गौशाला में पशु की तरह बंदी बनाकर रखा गया। यह घटना प्रेम और विवाह के मुद्दे में संरचनागत हत्या की वास्तविकता दर्शाती है।
हमारे जातीय ढांचे ने दलित युवाओं को प्रेम में एक भिन्न लेकिन समान रूप से क्रूर सजा दी है। जब दलित युवक गैर-दलित युवती से प्रेम करता है तो उसे हिरासत में मार दिया जाता है, वहीं दलित युवतियों को तिरस्कार और परिवार से बहिष्कार के कारण आत्महत्या करनी पड़ती है।
श्रीकृष्ण प्रकरण: राज्य की न्याय प्रतिबद्धता की परीक्षा
राज्य ने अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने की नीति बनाई है, फिर भी दलित पक्षीय उपेक्षा या हत्या पर चुप्पी असली समस्या है।
विजयराम महरा और शम्भु सदा जैसे घटनाओं की पिछली जांच समितियां भी दोषियों की रक्षा तक सीमित रहीं। खासकर श्रीकृष्ण विक मामले में जो तत्परता अब दिखाई दे रही है, वह केवल जन आक्रोश शांत करने के लिए नहीं, न्याय दिलाने के लिए होनी चाहिए।否则, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के साथ-साथ दलितों से माफी मांगी गई सरकार की नैतिकता भी गंभीर चोट खायेगी।
جب تک प्रेम और विवाह में दलित युवा जीवित न रह सकें या कैद न हों, तब तक राज्य की समावेशिता और नागरिक अधिकार केवल दिखावा होंगे। श्रीकृष्ण की मौत को आत्महत्या कहकर बंद नहीं किया जा सकता; इसे एक टेस्ट केस बनाकर दोषियों पर कार्रवाई करना आवश्यक है। अन्यथा हमारी हिरासत कक्ष केवल हाशिए पर रहे समुदायों का वध स्थल साबित होंगे और कानून दण्डहीनता की बदसूरत छवि बन जाएंगे।
नेपाली समाज में प्रेम के जातीय मूल्य इतने कठोर हैं कि दलित पुरुष प्रेम करते हैं तो हिरासत में मारे जाते हैं और दलित युवतियां प्रेम करती हैं तो अपनी जान समाप्त कर लेती हैं। राज्य अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देता है, लेकिन दलित पक्षीय मौतों पर मौन रहना सबसे बड़ा संरचनागत अपराध है।