
सुकुमवासी बालबालिकाओं के अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार की संवेदनशीलता आवश्यक
१८ वैशाख, काठमांडू। भूमिहीन और सुकुमवासी बस्तियों के बालबालिकाओं की स्थिति के प्रति सरकार को संवेदनशीलता दर्शानी चाहिए, ऐसा मांग विभिन्न हितधारकों ने किया है। वैशाख १२ से शुरू किए गए सुकुमवासी बस्तियों को खाली करने की सरकारी कार्ययोजना ने बालबालिका, प्रसवोत्तर महिलाएँ, वरिष्ठ नागरिक, विकलांग व्यक्ति तथा गर्भवती महिलाओ में गंभीर समस्या पैदा की है, ऐसा उन्होंने बताया। इसी विषय पर सरकार की संवेदनशीलता आवश्यक है, उनका मानना है। बालबालिका शांति क्षेत्र राष्ट्रीय अभियान (सिजप), बालमैत्री स्थानीय शासन राष्ट्रीय मंच और बाल विकास समाज ने संयुक्त रूप से एक चर्चा कार्यक्रम आयोजित किया था। नेपाल सरकार द्वारा भूमिहीन और सुकुमवासी बस्तियों को खाली एवं हटाने के क्रम में उत्पन्न समस्याओं तथा बालबालिकाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, संरक्षण और मनोवैज्ञानिक स्थिति पर पड़े प्रभाव पर चर्चा हुई।
नेपाल के संविधान की धारा १६ के अनुसार सभी नागरिकों को सम्मानजनक जीवन यापन का अधिकार प्राप्त है। इसी प्रकार संविधान में निहित अन्य अधिकारों को भी सरकार को संवेदनशीलता के साथ लागू करना चाहिए, इस बात पर चर्चा में शामिल लोगों ने जोर दिया। सिजप के अध्यक्ष तिलोत्तम पौडेल की अध्यक्षता में महिला, बालबालिका एवं वरिष्ठ नागरिक मंत्रालय के उप सचिव दुर्गाप्रसाद चालिसे, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के खिमानन्द बस्याल, राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद की देवी डोटेल समेत अन्य प्रमुख लोग उपस्थित थे। इस चर्चा में एनएसिजी की अध्यक्ष रितु भट्ट राई, भूमि अभियंता भगवती अधिकारी, सुवास नेपाली, इन्सेक के कृष्ण गौत्तम सहित ४० से अधिक हितधारकों ने भाग लिया।
सहभागियों ने बताया कि सुकुमवासी बस्ती हटाने के नाम पर वर्तमान कानूनी व्यवस्थाएं, विधिक प्रक्रिया, सूचना और सरकारी एजेंसियों के बीच प्रभावशाली समन्वय का अभाव मुख्य समस्या है। इससे बालबालिका, प्रसवोत्तर महिलाएं, गर्भवती महिलाएं, विकलांग व्यक्ति, यौनिक और लैंगिक अल्पसंख्यक, दीर्घ रोगी, परीक्षार्थी और स्कूल जाने योग्य उम्र के बालबालिकाओं पर व्यापक असर पड़ा है। एक ओर जहां डोजर से घर उजाड़े जा रहे हैं, वहीं १२वीं कक्षा की परीक्षा दे रहे छात्रों को बहुत कष्ट उठाना पड़ रहा है। साथ ही छोटे बच्चों को दूध पिलाने के लिए आवश्यक दैनिक वस्तुएं खरीदने में भी असुविधा हो रही है, ऐसी पीड़ादायक घटनाएँ चर्चा में सामने आईं।
पहले चरण में सुकुमवासी तथा भूमिहीन लोगों के आंकड़े जमा करने और दूसरे चरण में आवासीय प्रबंध करके ही बस्ती हटाने का सुझाव हितधारकों ने दिया है। राज्य की ओर से बेहद सीमांत, दलित, जोखिम में रहने वाले परिवारों और बाल युवाओं के अभिभावकों की भूमिका निभाने की बजाय जबरदस्ती डोजर चलाकर घर बेघर करना अतिरिक्त पीड़ा उत्पन्न कर रहा है, इसकी आलोचना की गई। अपने ही आंखों के सामने अपना घर और विद्यालय तबाह होते देख बालबालिकाओं की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को सरकार ने नजरअंदाज किया है, इस बात को भी चर्चा में उठाया गया। सहभागी लोगों ने बताया कि बस्ती हटाने के दौरान बालबालिकाओं के नागरिकता, जन्म प्रमाण पत्र, शैक्षिक प्रमाणपत्र, पाठ्यपुस्तकें, स्कूल की पोशाक और उम्र के अनुसार पोषणयुक्त आहार में भी समस्याएं देखी गई हैं। साथ ही होल्डिंग सेंटर और अन्य स्थानों पर रहने के दौरान हिंसा, दुर्व्यवहार और गोपनीयता जैसे मुद्दों पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।