
शहर में एक भारी बोहत मजदूर का जीवन संघर्ष
समाचार का संक्षिप्त संपादकीय समीक्षा के बाद तैयार। जीवन के परिवार में उसकी पत्नी और बच्चे हैं, जो मिलकर मजदूरी करते हैं लेकिन ऋण और दैनिक खर्चों की वजह से उनका आर्थिक संकट बना हुआ है। ‘दादू, आप लोग कितने बजे सोते हैं?’ उसने पूछा। ’10 बजे,’ मैंने उत्तर दिया। ‘तो मैं 10 बजे तक भारी लेकर डिस्टर्ब नहीं करूंगा,’ उसने कहा। मैंने मना कर दिया। घर की छत पर लेवलिंग का काम था। उसे जमीन से दो मंजिल ऊपर बालू और बजरी पहुंचानी थी। ठेकेदार भारी के अनुसार मजदूरी देता था। वह अपने काम में व्यस्त हो गया, मैं अपने काम में लग गया। हम 9 बजे खाना खाए। मुझे पता था कि उसने खाना खा लिया है। ‘खाना खाकर आया दादा, जल्दी खाना खाने वाला हूँ, बूढ़ी बना रही है,’ उसने कहा। लेकिन वह 9 बजे तक नहीं रुका और चला गया। जाने से पहले उसने मुझसे अगले दिन कितने बजे उठना है, ये तय करने को कहा। वह शाम 5 बजे तक नियमित काम करता और 6 बजे से 9 बजे तक ओवरटाइम करता था। मैं विदेश में नौकरी करते वक्त इतनी देर काम करता था। ‘सुबह लगभग 4 बजे उठता हूँ,’ मैंने कहा। अगले दिन सुबह 4 बजे उठकर दरवाजा खोला, पर उसका पिछला दिन का वादा पूरा नहीं हुआ था, इसलिए मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। चलने की स्थिति नहीं थी। हमारे सभी नियम उस जीवन पर भी लागू हुए। लेकिन 6 बजे वह अचानक आ गया। ‘मेरा तो खराब हो गया दादा,’ उसने कहा। ‘क्यों?’ मैंने पूछा। ‘गेट अपना काम नहीं कर रहा, लेकिन मैंने मदद करने वाला साथी लाया हूँ।’ ‘इला रानी, जल्दी काम करो,’ उसने नेपाली और मगर भाषा में पत्नी को आदेश दिया। करीब 1 घंटे के श्रम के बाद, ‘अब चलते हैं दादा, कमरे में जाकर खाना खाकर ड्यूटी करूंगा।’ 6:30 बजे वह वापस आए। पत्नी बालू भरने और पति ऊपर पहुंचाने का काम चुपचाप करने लगे। सीमेंट के बोरे में बालू और बजरी भरते। लौटते वक्त दो सीढ़ियां एक साथ चढ़कर थोड़ी जल्दी करने की कोशिश करते। मैं उन्हें देख रहा था, छोटी बेटी को गोद में लेकर। 7:30 बजे पत्नी वापस आई, अब वह अकेले भारी भरने और उठाने लगी। 8 बजे मैंने उसे पानी दिया। पर उसने पानी पीने से इंकार कर दिया। मैंने ग्लूकोज पानी बनाकर पुनः आग्रह किया। ‘हाँ, पानी पीना जरूरी है। पानी न पिया तो किडनी खराब हो जाएगी। मेरे भाई की छह साल पहले किडनी फेल हो गया था,’ उसने बताया। ‘पत्नी क्या कर रही है?’ मैंने पूछा। ‘वह खाना बना रही है। मैं लेट जाऊंगा इसलिए गेट खोल देगी। इसलिए मैं देर तक काम कर सकता हूँ।’ ‘कितने बजे तक काम करोगे?’ मैंने पूछा। ‘जब मन करे तब तक।’ मैंने कोई समय सीमा तय करने की आवश्यकता नहीं समझी। उसने ठेकेदार से समझौते के अनुसार कभी बजरी, कभी बालू उठाई थी। हर भारी गिनती आसान हो यह भावना से एक बटुआ में बजरी रखता था। मैं सोया तक वह ईंट बजा रहा था। अगला दिन भी। शायद वह पूरा नहीं सो पाया था, या समस्या की वजह से सो नहीं पाया। हमारी भी शाम की फुर्सत कम होती है। बेटी को सुलाने, खाना पकाने, खाने का काम 9-10 बजे के बीच होता है। खाना तैयार होने पर पत्नी ने उसे खाने के लिए बुलाया। ‘कमरे में पहले से ही खाना तैयार है, आप लोग खाइए,’ उसने मुस्कुराते हुए कहा और फिर काम में लगा रहा। रात 10 बजे सुनसान सड़क पर बेलचा की खड़खड़ाहट दिल तोड़ने वाली लगती थी। पड़ोसी सो चुके थे। जो किराये के मकान में रहता था, उसने उसके कर्म को देखकर सराहना की। उसने लंबी सांस लेकर कहा, ‘यह मानव चोला कहाँ है? किसी के पास संपत्ति संभालने का वक्त नहीं, किसी के पास ये भारी उठाने का साहस!’ मैं चुप था। कभी-कभी चुप्पी गहरी होती है। मुझे उसके जीवन का पार्श्व संगीत सुनना था, उसके उतार-चढ़ाव की कहानी लिखनी थी। 10 बजकर 30 मिनट हो गये थे। मैं मोबाइल बंद कर उसके पास गया। मटमैला टी-शर्ट, धूल जमी थी। फेस पर पसीना विशेष नहीं था। शायद मुझसे हल्का पसीना था। ‘कितने बजे तक काम करते हो?’ मैंने पूछा। ‘आप लोग कितने बजे सोते हैं?’ उसने जवाब दिया। ‘मैं लगभग 11 बजे सोता हूँ, आपकी मेहनत की कद्र करनी चाहिए।’ मैंने कहा। उसने फिर कहा, ‘डिस्टर्ब हुआ क्या?’ ‘डिस्टर्ब नहीं, पर…’ मैंने विषय बदल दिया। ‘अब जाओ, कल करो। शरीर, बजरी, बालू, सीमेंट एक समान नहीं हैं। आराम जरूरी है।’ मेरी बात सुनकर उसने सहमति जताई। ‘सुबह कितने बजे उठते हो?’ ‘5 बजे।’ ‘मैं तो 3 बजे उठना था!’ मैं चौंक गया। ‘आपको सोना जरूरी नहीं?’ मैंने पूछा। ‘3-4 घंटे सोया तो निंद्रा पूरी हो जाती है। मैं हमेशा 3 बजे उठता हूँ।’ तूफानी! 18-20 घंटे मजदूरी, 3 घंटे आराम! इस काम का शोषण कौन कर रहा है? मैं भी मौन था। ‘सायकिल यहीं रखता हूँ।’ वह जाते वक्त बोला। ‘क्यों?’ ‘गेट बंद होता होगा, नागर आसानी से नहीं।’ ‘पत्नी नहीं खोलती?’ ‘वह भी दिनभर काम से थकी होती है, सो रही होगी।’ मैंने कुछ नहीं कहा। ‘हाँ, सुबह आ जाऊंगा।’ सायकिल छोड़कर चला गया। *** पत्थर फेंकने की आवाज आती रही। – पत्थर चोरी कर रहे हैं या क्या? मेरे पास एक नया मकान बनने वाला है, जिसके लिए वह व्यक्ति पूरी रात बालू ले गया था। सच में वह रातभर सांस लेकर काम कर रहा था। घर में लाइट जल रही थी, घड़ी ने 4:10 बजना बताया। अंदर दंपत्ति धीरे-धीरे काम कर रहे थे। लगातार नहीं सो पाने वाला, मेहनत में लगा इंसान की कहानी यह है। जीवन, यानी वह इंसान। संवत् 2050 में जन्मा जीवन ने 11 वर्ष की उम्र में पिता खो दिया। तब पढ़ाई बंद हो गई। उसका बचपन गृहयुद्ध की चपेट में था। जीवन ने भी अनगिनत जुदाई खेली। विदेश मलेशिया में काम करके थोड़ी पूंजी इकट्ठा की और घर लौट आया। बुजुर्गों के साथ मिलकर खेती में लगा लेकिन ऋण और समस्या बनी रही। बच्चों के लिए बड़े सपने के साथ जीवन संघर्ष कर रहा है। फिर भी वह आरामदायक रास्ता खोजने की कोशिश करता है, घर पाल नहीं सका तो जन्मस्थल से जोडने की कोशिश। ‘महीने में कितने दिन काम करते हो?’ मैंने पूछा। ’14 से डेढ़ महीने तक। एक दिन मिलता है छुट्टी।’ ‘दिन में कितने घंटे?’ ‘सुबह 4 से 7, 8 से 5 नियमित, शाम 6:30 से 10 ओवरटाइम।’ ‘कमाई कैसी है?’ ‘रोजाना 700 से 850 रुपये। महीने के अंत में इतना ही रहता है। पर ऋण चुकाना होता है।’ ‘ऋण कितना?’ ‘5-7 लाख।’ ‘कितना ब्याज देना पड़ता है?’ ‘कभी ज्यादा, कभी कम।’ शिक्षा और जीवन संघर्ष में बहुत दर्द छुपा है। ‘कब तक भारी उठाते हो?’ ‘जब तक भूख भूल जाऊं, पेट भरा रहे और शरीर उठाने में सक्षम हो, तब तक।’ पूंजी इकट्ठा करके छोटा खेत लगाने का विचार है, इतना भारी उठाना उससे बेहतर है। लेकिन मजबूरी और परिस्थिति ऐसी है कि हर दिन भारी उठाना पड़ता है। शरीर और मन को थका नहीं देना चाहिए पर उसकी जीवनशैली इसे संभव नहीं करती। उसकी कहानी है मेहनत, संघर्ष और साहस की अनंत गाथा। शहर की भीड़ में एक ऐसा मजदूर है, जिसके सिर पर सिर्फ बोझ ही नहीं, परिवार की उम्मीद और भविष्य भी टिका है।