
श्रम का सम्मान और सुरक्षा कब होगी?
१८ वैशाख, काठमाण्डौ। वैशाख १८ अर्थात् १ मई, विश्वभर के श्रमिकों के हक-अधिकार के लिए जागरूकता का दिन है।
‘आठ घंटे काम, आठ घंटे मनोरंजन और आठ घंटे आराम’ का नारा सन १८८६ में अमेरिका के शिकागो से शुरू हुआ था, लेकिन २०८३ तक नेपाल में यह नारा अधिकांश के लिए केवल एक प्यारा सपना ही बना हुआ है।
आज विश्व स्तर पर १३७वां अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाए जाने के बीच काठमाण्डौ के चौराहों से लेकर खाड़ी की मरुस्थलीय क्षेत्रों तक फैले नेपाली श्रमिकों का एक ही सवाल है — ‘हमारे मुद्दों पर सरकार कब गंभीर होगी?’
नेपाल के संविधान और श्रम ऐन २०७४ ने श्रमिकों के अधिकारों को बेहतरीन तरीके से परिभाषित किया है, लेकिन उनके क्रियान्वयन में काफी कमजोरियाँ नजर आती हैं।
श्रम तथा आव्रजन विशेषज्ञ डॉ. जीवन बानियाँ के अनुसार नेपाल में नीति सुधार हुए हैं, लेकिन उसका लाभ वास्तविक श्रमिक तक पहुँच नहीं पाया है।
‘नीतिगत रूप में कई परिवर्तन हुए हैं, आईएलओ के मानकों और हमारे श्रम ऐन ने श्रमिक अधिकारों को संबोधित किया है, लेकिन व्यवहार में समस्याएँ हैं,’ वे बताते हैं। ‘कम से कम वेतन १९,५०० तो तय किया गया है, लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक इस वेतन से वंचित हैं, विशेष रूप से कृषि और छोटे प्रतिष्ठानों में काम करने वाले पुरुष एवं महिलाएं ५ से १० प्रतिशत अधिक जोखिम में हैं।’
वानियाँ बताते हैं कि नेपाल का श्रम प्रशासन अभी भी केन्द्रित है। बागमती प्रदेश के श्रम कार्यालय द्वारा कितने जिलों या प्रतिष्ठानों का निरीक्षण संभव है, यह सवाल बनता है।
श्रम निरीक्षकों की संरचना कमजोर है। प्रतिष्ठान द्वारा की जाने वाली श्रम ऑडिट भी विश्वसनीय नहीं है। ऐसी प्रवृत्ति है कि १०० कर्मचारियों वाले स्थल ३० व्यक्तियों का विवरण दिखाकर बाकी को सामाजिक सुरक्षा से वंचित कर देते हैं।
विश्वव्यापी तौर पर करीब २९ लाख लोग कार्य से संबंधित दुर्घटना में अपनी जान गंवाते हैं। ४० करोड़ २ लाख लोग कार्य से जुड़ी दुर्घटना, रोग और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं।
राष्ट्रिय व्यवसायजन्य सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रोफाइल २०७८ के अनुसार नेपाल में २०१० से २०१९ के बीच ३९४ कार्यस्थल दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें ४६ लोगों की मृत्यु हुई।
श्रम और व्यवसायजन्य सुरक्षा विभाग की २०८० की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार २०७८ से २०८० की अवधि में ९५ दुर्घटनाएं हुईं। सामाजिक सुरक्षा कोष ने २०८० में २,८८३ मामलों के लिए दुर्घटना तथा अपंगता योजना के तहत मुआवजा उपलब्ध कराया।
नेपाल के श्रम विशेषज्ञ रामेश्वर नेपाल के अनुसार नीति निर्माण प्रक्रिया ‘त्रुटिपूर्ण’ है, जो श्रमिकों के भविष्य को निर्धारित करती है।
‘नीति आवश्यकताओं के अनुरूप और संबंधित पक्षों की सलाह से बननी चाहिए, लेकिन यहाँ तो सिंहदरबार में कमरे में बैठकर नीति बनाई जाती है,’ वे कहते हैं।
नेपाल में बेरोजगारी का एक अनूठा विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर सरकार के मंत्री श्रमिकों की कमी को लेकर ठेकेदारों की आलोचना करते हैं, वहीं दूसरी ओर रोजाना हजारों युवा त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से श्रम बेचने विदेश जाते हैं।

‘२०७५ में प्रतिदिन लगभग १२ सौ लोग जाते थे, अब यह संख्या २४ सौ से अधिक हो गई है। पाँच वर्षों में वैदेशिक रोजगार समाप्त करने के सरकार के वादे केवल कागज पर साबित हुए,’ नेपाल कहते हैं।
वे सोचते हैं कि बेरोजगारी का असली माप वैदेशिक रोजगार की संख्या है। ‘जब तक स्वरोजगार को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा और श्रमिकों को छह माह दफ्तर-दफ्तर का चक्कर लगाना पड़ेगा, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी,’ उनका कहना है।
नेपाल ट्रेड यूनियन महासंघ (जिफन्ट) के अध्यक्ष विनोद श्रेष्ठ श्रम बाजार की एक कड़वी तस्वीर पेश करते हैं। ‘आज स्थिति ऐसी है कि पिता मजदूर की तलाश में जाते हैं, बेटा नौकरी की खोज में, परंतु शाम को घर लौटने पर न पिता को मजदूर मिलता है, न बेटे को नौकरी,’ वे कहते हैं।
ये विडंबना मर्यादित रोजगार की कमी का परिणाम है। श्रेष्ठ के अनुसार न्यूनतम वेतन से परिवार का भरण-पोषण संभव नहीं होता, इसलिए युवाओं का यहां रहना मुश्किल होता है, वे केवल ‘सांस चलती रहे’ कहने के लिए ही रहते हैं।
दूसरी ओर, उद्योगपतियों की सोच में भी कमी है। ‘उद्योगपति श्रमिकों को दिए जाने वाले वेतन को निवेश नहीं, खर्च मानते हैं; मशीन और जमीन में निवेश करना पसंद करते हैं, लेकिन व्यक्ति में निवेश करने से डरते हैं,’ वे कहते हैं।
श्रम मंत्रालय को राजनीतिक दलों और सरकार द्वारा हमेशा ‘अपरिपक्व मंत्रालय’ माना जाता है, श्रेष्ठ बताते हैं। ‘किसी अन्य मंत्रालय न मिलने पर ही श्रम मंत्रालय लेने की सोच रहती है। जब समाज रोबोटिक्स, फिनटेक और एआई के युग में है, हमारी श्रम नीतियां अभी भी पुराने युग की सीमित सोच में फंसी हैं,’ वे कहते हैं।
श्रमिकों की समस्याएं पारंपरिक तरीकों से हल नहीं होंगी। श्रमिक दिवस सिर्फ एक औपचारिक कैलेंडर इवेंट बन कर रह गया है, वह आंतरिक रोज़गार पर जोर देते हैं।
‘श्रम का सम्मान ही देश विकास की नींव है’ की भावना को अपनाते हुए सभी क्षेत्रों के श्रमिकों के लिए उचित वेतन, सम्मानजनक कार्यस्थल और श्रमिक अधिकार सुनिश्चित करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है।
श्रम, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा मंत्री रामजी यादव ने सभी पेशे और वर्ग के श्रमिकों को राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाला बताया और सबके योगदान का सम्मान, मूल्यांकन और कृतज्ञता व्यक्त करने की संस्कृति मजबूत करने पर बल दिया।

श्रम विशेषज्ञ नेपाल ने श्रम प्रशासन को स्थानीय स्तर तक विस्तारित करने की वकालत की और स्थानीय तहों को श्रमिकों का पंजीकरण और वेतन विवाद समाधान का कानूनी अधिकार दिए जाने की जरूरत बताई।
इसके अलावा अनौपचारिक क्षेत्र और स्वरोजगार श्रमिकों के लिए सरकार को ‘कस्ट शेयरिंग’ अवधारणा लागू कर उन्हें सामाजिक सुरक्षा से जोड़ना चाहिए, उनका जोर है।
डॉ. बानियाँ के अनुसार, नए स्टार्टअप को दर्ता के समय भारी सामाजिक सुरक्षा शुल्क के बजाय शुरुआती वर्षों में कर में छूट और आसान ऋण की व्यवस्था करनी चाहिए।
साथ ही, निजी क्षेत्र के साथ समन्वय कर आवश्यक कौशल का प्रशिक्षण देना और श्रमिकों को सम्मानजनक माहौल में कार्य करने को सुनिश्चित करना आवश्यक है।
वैदेशिक रोजगार से भेजे गए रेमिटेंस पर देश निर्भर नहीं रह सकता, क्योंकि देश के ८० प्रतिशत रेमिटेंस खाद्य, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च हो रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि हमारी सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक संस्थाएं विफल हैं, विशेषज्ञों का विश्लेषण है।
इसलिए श्रम का सम्मान केवल १ मई के भाषण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे वर्ष ३६५ दिन श्रमिकों के जीवन और कार्यस्थलों में दिखना चाहिए, यही इनका निष्कर्ष है।