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मानव के साथ सह-अस्तित्व ने कुत्ते के मस्तिष्क में लाया बड़ा बदलाव, अध्ययन में क्या कहा गया?

पालतू बनने के दौरान कुत्ते के मस्तिष्क का आकार लगभग ४६ प्रतिशत तक घट गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनकी बुद्धिमत्ता में कमी आई है, ऐसा वैज्ञानिकों ने बताया है। इंसान और कुत्ते के बीच हजारों वर्षों पुराना रिश्ता माना जाता है। जंगली भेड़िये के वंशज माने जाने वाले कुत्ते आज इंसान के सबसे करीबी साथी हैं। घर की सुरक्षा, शिकार, पशुपालन से लेकर भावनात्मक साथी तक के अनेक रोल में कुत्ता खुद को स्थापित करता आ रहा है। लेकिन इंसान के साथ इस निकटता ने न केवल उनके शारीरिक और व्यवहारिक तौर-तरिके, बल्कि मस्तिष्क में भी बड़े परिवर्तन लाए हैं, ऐसा एक नए अध्ययन ने दिखाया है। वर्तमान में रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार पालतू बनाए गए कुत्तों के मस्तिष्क का आकार करीब ४६ प्रतिशत तक छोटा पाया गया है। हालांकि शोधकर्ताओं ने इसे सीधे बुद्धिमत्ता में गिरावट के साथ जोड़ने से इंकार किया है।

‘नियोलिथिक युग’ के बाद नजर आए इस बड़े परिवर्तन को लेकर विज्ञान ने लंबे समय से यह सवाल उठाया है कि जब कुत्ते इंसान के साथ रहने लगे, तो उनके सोचने की क्षमता, व्यवहार और मस्तिष्क में क्या-क्या बदलाव आए? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए फ्रांस के वैज्ञानिकों ने व्यापक शोध किया। उन्होंने आधुनिक कुत्तों, डिंगो और भेड़ियों समेत २०७ कपालों का अध्ययन किया, जिनमें २२ प्रागैतिहासिक नमूने भी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने सीटी स्कैन तकनीक का उपयोग कर खोपड़ी के अंदर की संरचना का वर्चुअल मॉडल तैयार किया, जिससे मस्तिष्क आकार का भरोसेमंद डेटा प्राप्त हुआ। अध्ययन में पाया गया कि लगभग १५ हजार साल पहले इंसानों ने कुत्तों को पालतू बनाना शुरू किया था, पर उस शुरुआती दौर में कुत्तों का मस्तिष्क भेड़िये जैसा बड़ा था। असली बदलाव नियोलिथिक युग में शुरू हुआ।

नियोलिथिक युग वह ऐतिहासिक काल है जब इंसानों ने घुमंतू जीवनशैली छोड़कर स्थायी कृषि करना शुरू किया। गांव और बस्तियों में बसने लगे, तब कुत्तों की भूमिका भी बदलने लगी। पहले जंगली परिवेश में जटिल निर्णय लेने पड़ते थे, लेकिन अब कुत्ते इंसानों के आसपास रहते, बस्ती की रक्षा करते और भोजन पर निर्भर रहते थे। शोधकर्ताओं के अनुसार जीवनशैली में इस बदलाव ने कुत्ते के मस्तिष्क की संरचना पर प्रभाव डाला होगा। अध्ययन के मुख्य लेखक थोमस चुची कहते हैं, ‘पालतू बनाना मूर्खता नहीं लाता, बल्कि इंसान को समझने की क्षमता बढ़ाता है।’ ‘आज के कुत्ते अपनी बुद्धिमत्ता का पूरा उपयोग शायद न कर पाएं, लेकिन वे बेहद चतुर हैं। पालतू बनाने से उनकी बुद्धिमत्ता कम नहीं हुई, बल्कि इंसानों को समझने और संवाद करने में उन्हें और अधिक कुशल बनाया गया है।’

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