
सर्वोच्च अदालत में दो समूहों के बीच विवाद तेज हुआ
२९ वैशाख, काठमांडू। संविधान परिषद् ने परंपरा तोड़ते हुए चौथे वरिष्ठ न्यायाधीश डॉ. मनोज शर्मा को प्रधान न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए सिफारिश करने के चार दिन बाद सोमवार को संवैधानिक पीठ जमा हुई। कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल के नेतृत्व वाली इस पीठ में उनके बाद के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश कुमार रेग्मी और हरि फुयाल उपस्थित थे। प्रधान न्यायाधीश के रूप में नामित हुए बाद से डॉ. मनोज शर्मा इस संवैधानिक पीठ में शामिल नहीं हुए हैं, वे अनुपस्थित रहे। इस दौरान तीन अन्य न्यायाधीश डॉ. नहकुल सुवेदी और तिलप्रसाद श्रेष्ठ अवकाश पर थे, जबकि विनोद शर्मा और शारंगा सुवेदी संवैधानिक पीठ में उपस्थित थे।
संवैधानिक पीठ में सुनवाई के दौरान दो याचिकाओं पर न्यायाधीशों के बीच मतभेद उभरे। पहली याचिका में, निज़ामती सेवा में ट्रेड यूनियन खत्म न करने का अंतरिम आदेश जारी किया गया। कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान के साथ न्यायाधीश कुमार रेग्मी और हरि फुयाल ने निज़ामती सेवा में ट्रेड यूनियन हटाने वाले अध्यादेश की व्यवस्था को फिलहाल लागू न करने का निर्णय दिया। वहीं, न्यायाधीश शारंगा सुवेदी और विनोद शर्मा ने अंतरिम आदेश जारी करना आवश्यक न होने की दलील देते हुए अलग मत व्यक्त किया।
इसी तरह, एक अन्य मामले में भी संवैधानिक पीठ में मतभेद देखे गए। सुदूरपश्चिम प्रदेश सभा द्वारा जारी कानून की संघीय कानून से टकराहट के विवाद में तीन न्यायाधीशों ने अल्पकालीन अंतरिम आदेश दिया। इसके विपरीत, न्यायाधीश विनोद शर्मा और शारंगा सुवेदी ने इस विवाद को संवैधानिक पीठ में लाए जाने की आवश्यकता पर प्रश्न उठाए तथा बिना चर्चा के अंतरिम आदेश जारी करने पर असहमति व्यक्त की।
सर्वोच्च अदालत के एक न्यायाधीश के अनुसार हाल की घटनाओं के बाद न्यायाधीशों के बीच आपसी समझ कमजोर होने लगी है और गुटबंदी की संभावना अधिक है। उन्होंने बताया, ‘पिछले बुधवार को संविधान परिषद ने डॉ. मनोज शर्मा का नाम सिफारिश करने के बाद सर्वोच्च अदालत में न्यायाधीश दो समूहों में बंट गए हैं, और इसका प्रभाव विभिन्न रूपों में नजर आ रहा है। हम न्यायव्यवस्था पर कोई असर न पड़े, इस बात के लिए सतर्क थे, लेकिन घटनाक्रम को देखकर इसे रोक पाना मुश्किल लगता है।’