Skip to main content
प्रधानमन्त्री शक्तिशाली बन्ने रहर, तानातानमा गुप्तचर

प्रधानमंत्री की शक्तिशाली बनने की लालसा, गुप्तचर एजेंसियों में टकराव

समाचार सारांश

समीक्षा पश्चात तैयार।

  • नेपाल सरकार ने ३० वैशाख को राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग को प्रधान मंत्री और मंत्रिपरिषद् कार्यालय के अधीन रखने के लिए कार्यविभाजन नियमावली में संशोधन किया।
  • गुप्तचर एजेंसी को गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच बार-बार स्थानांतरित किया गया है और फिलहाल यह फिर से प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन है।
  • पूर्व गुप्तचर प्रमुख और विशेषज्ञों ने गुप्तचर को आंतरिक एवं बाहरी दो एजेंसियों में विभाजित कर सशक्त बनाने का सुझाव दिया है।

१ जेठ, काठमांडू। नेपाल सरकार ने ३० वैशाख को कार्यविभाजन नियमावली में संशोधन कर देश की एकमात्र गुप्तचर एजेंसी राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग (राअवि) को प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् कार्यालय के अधीन रख दिया।

रजपत्र में प्रकाशित प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद् कार्यालय के कार्यविभाजन सूची की २८वीं संख्या के अनुसार यह विभाग अब प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन रहेगा।

राअवि को पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन नहीं रखा गया है। केपी शर्मा ओली के प्रधानमंत्रित्व काल में यह विभाग गृह मंत्रालय से प्रधानमंत्री कार्यालय में स्थानांतरित किया गया था।

लेकिन छह महीने भी पूरे न होने पर इसे ५ मंसिर २०८२ को फिर से प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन कर दिया गया।

तत्कालीन गृह मंत्री सुधन गुरुङ ने १९ चैत को संसद में गुप्तचर एजेंसी को केवल गृह मंत्रालय के अधीन रहने का विषय उठाया था।

प्रधानमंत्री कार्यालय में बजट लिखा जा रहा है ?

‘२०७५ में प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन लगने से पहले राअवि गृह मंत्रालय के अधीन था। सूचना संग्रह, विश्लेषण और अन्य एजेंसियों के साथ प्रभावी समन्वय के कारण इसे गृह मंत्रालय में ही रखने का फैसला नेपाल सरकार ने किया था, जिसके चलते संशोधन अध्यादेश प्रस्तुत किया गया है,’ तत्कालीन गृह मंत्री गुरुङ ने कहा था।

गुरुङ के यह कहने के डेढ़ महीने बाद ही उनकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने गुप्तचर एजेंसी को पुनः अपने अधीन लाया।

गृह मंत्रालय के अधीन रहना चाहिए, ऐसे विचार रखने वाले मंत्रियों की बैठक में सरकार ने १५ चैत को प्रकाशित सुशासन मार्गचित्र २०८२ में गुप्तचर एजेंसी को प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन रखने का सुझाव दिया गया था।

प्रधानमंत्री कार्यालय का दावा है कि सुशासन मार्गचित्र के अनुसार गुप्तचर एजेंसी को और मजबूत बनाने के लिए इसे उनके अधीन लाया गया है।

नेपाल सरकार के सचिव गोविन्दबहादुर कार्की की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा बनाया गया ८०२ पन्नों वाला मार्गचित्र स्पष्ट रूप से गुप्तचर को प्रधानमंत्री कार्यालय अधीन रखने की सलाह देता है।

‘विभाग का बार-बार मंत्रालय बदलने के बजाय प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन स्थायी रखना चाहिए,’ मार्गचित्र में लिखा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय अधीन लाने के लिए तीन महीनों के भीतर कार्य पूरा करने का निर्देश भी है, जिसे संस्थागत स्थिरता लाने वाला माना जा रहा है।

डेढ़ महीने के भीतर ही गुप्तचर एजेंसी प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंच चुकी है। पुराने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए पूर्व प्रमुख देवीराम शर्मा ने इस निर्णय का स्वागत किया है।

‘ओली के कार्यकाल में भी इसे प्रधानमंत्री कार्यालय अधीन लाना सही था। बीच में गृह मंत्रालय में लेकर आना गलत था। अब फिर सही निर्णय हुआ है,’ शर्मा कहते हैं।

शक्तिशाली बनने की होड़

गुप्तचर एजेंसी को वह शक्तिशाली बनाने की होड़ नेताओं के बीच नजर आती है, जो इसे अपनी पकड़ में करने की कोशिश करते हैं। वर्तमान में प्रधानमंत्री बालेन्द्र ने इसे अपने अधीन लाया है, जबकि ओली ने भी १६ फागुन २०७४ को खुद इसे अपनी मातहत किया था।

सरकार का आँख, कान और नाक मानी जाने वाली गुप्तचर की सूचनाओं की सफलता पर सरकार निर्भर होती है।

गृह मंत्रालय

गृह मंत्रालय के अधीन रहते हुए यह बेकार साबित हुई, इसलिए ओली ने इसे निजीकरण का आरोप लगाकर अपने अधीन लाया।

पूर्व एआईजी देवराज भट्ट कहते हैं कि गुप्तचर को सशक्त बनाने के लिए ओली ने इसे अधीन लाया था, लेकिन आठ-साढ़े आठ वर्षों में यह कितना सशक्त हुआ, इसकी समीक्षा जरूरी है।

‘गृह मंत्रालय में रहने के दौरान अस्पष्टता हुई, इसलिए ओली ने इसे स्वयं अधीन लिया – पर क्या सुधार हुआ? क्या यह कितना मजबूत हुआ? जवाब देने में मुश्किल होगी,’ भट्ट कहते हैं।

उनका कहना है, ‘महत्वपूर्ण यह है कि गुप्तचर को कहाँ रखा गया, उससे अधिक जरूरी यह है कि उसे किस प्रकार मजबूत किया गया। संस्थाओं को मजबूत करने के बजाय इसे अपने फायदे के लिए दुरुपयोग की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है।’

ओली के शासनकाल में गुप्तचर को शक्तिशाली बनाने के दावे के बावजूद सूचनाओं के भरोसेमंद न होने के कारण हेलीकॉप्टर से भागने जैसी घटनाएं भी हुईं।

२३ और २४ भदौ को हुए जनजाति आंदोलन की खबर गुप्तचर ने पकड़ नहीं पाई थी, जिसके कारण सुरक्षा व्यवस्था असफल रही और दो तिहाई सरकार दो दिन में धराशायी हो गई।

इसी दौरान गुप्तचर द्वारा नेताओं के फोन टैप करने का मामला सार्वजनिक हुआ।

१४ पुस २०७७ को माओवादी नेता वर्षमान पुन ने आरोप लगाया था कि ओली ने गुप्तचर को राजनीतिक दलों के नेताओं के फोन टैप में लगाया है।

उन्होंने रोल्पा लिवाङ में कहा था, ‘सभी नेताओं के फोन टैप हो रहे हैं, गुप्त बातें करना मुश्किल हो गया है और मीडिया के माध्यम से नेताओं को भयभीत किया जा रहा है।’

पुन ने व्यापारियों के फोन टैपिंग का गंभीर आरोप भी लगाया था।

प्रधानमंत्री कार्यालय अधीन लाकर इसे मजबूत बनाने का प्रयास करते हुए पूर्व अध्यक्ष सुशीला कार्की ने दुरुपयोग के डर से इसे पुनः गृह मंत्रालय के अधीन रखा था।

सुशीला कार्की

अब जब फिर से इसे शक्तिशाली बनाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा गया है, तो दुरुपयोग का भय भी बढ़ा है।

हालांकि गुप्तचर के कुछ कर्मचारी और प्रधानमंत्री कार्यालय दावा करते हैं कि इसे सशक्त बनाने की पहली ही चरण में प्रधानमंत्री कार्यालय अधीन लाया गया है और नई सरकार इस पर काम कर रही है।

‘प्रधानमंत्री जी वर्तमान में गुप्तचर को पूर्ण रूप से सशक्त बनाने की इच्छा रखते हैं। हमें यही काम सौंपा गया है और हम काम कर रहे हैं। अधीन आने के बाद यह और मजबूत होगा, इसमें हम विश्वास रखते हैं,’ गुप्तचर के एक अधिकारी ने कहा।

चुनाव में अपनी पक्षधर सूचना संग्रह से लेकर विरोधी गतिविधियों की निगरानी तक गुप्तचर का दुरुपयोग होता रहा है।

सरकार गुप्तचर तंत्र का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करती है। पूर्व आयुक्त लोकमानसिंह कार्की प्रकरण में भी यह देखा गया था, जिसमें उन्होंने व्यक्तियों को डराने के लिए गुप्तचर का इस्तेमाल किया था।

गुप्तचर को कहां रखा जाए?

शक्ति प्राप्ति की चाह में गुप्तचर एजेंसी को कहां रखा जाए, इस पर लंबे समय से विवाद चलता आ रहा है। कभी पुलिस, कभी गृह मंत्रालय, तो कभी प्रधानमंत्री कार्यालय में रखने की प्रथा रही है।

परिणाम स्वरूप यह बहस निरंतर जारी है कि गुप्तचर एजेंसी को किस निकाय के अधीन रखना सही होगा। फिलहाल बाहरी गुप्तचर एजेंसी न होने और राअवि के द्वारा केवल आंतरिक सुरक्षा देखे जाने के कारण कुछ विशेषज्ञ गृह मंत्रालय के अधीन रखने की सलाह देते हैं।

दूसरी ओर कुछ का मानना है कि इसे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन ही रखा जाना चाहिए। पूर्व एआईजी भट्ट कहते हैं, ‘सिद्धांततः तो इसे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में गृह मंत्रालय में रहना उचित लगता है।’

जब बाहरी गुप्तचर की जिम्मेदारी होती है, तब इसे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन रहना चाहिए। लेकिन राअवि केवल आंतरिक गुप्तचर करता है, इसलिए व्यवहारिक तौर पर गृह मंत्रालय के अधीन रहना उपयुक्त है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन होते हुए भी गुप्तचर गृह मंत्रालय का अंग जैसा प्रतीत होता है। वहीं, वहां भी गृह मंत्री के आदेश पर गुप्तचर सक्रिय होता है।

गृह मंत्रालय में भी गुप्तचर का एक सहायक पुलिस निरीक्षक (एसपी) पद है। राअवि के पूर्व प्रमुख देवीराम शर्मा कहते हैं, ‘देश की सरकार के प्रमुख को पहली सूचना प्राप्त होने का अधिकार होना जरूरी है। इसलिए गुप्तचर को प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन ले जाना आवश्यक है।’

उन्होंने कहा कि दो प्रकार के गुप्तचर की जरूरत है – एक आंतरिक और दूसरा बाहरी। बाहरी गुप्तचर को प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन होना आवश्यक है।

‘जब भारत और चीन के बीच लिपुलेक संधि हुई तो हमारा गुप्तचर कहाँ था?’ वे प्रश्न करते हैं। ‘पुरानी व्यवस्था बनाए रखना स्वीकार्य नहीं है।’

भारत में गुप्तचर एजेंसियां आईबी आंतरिक मामलों के लिए और रॉ बाहरी मामलों के लिए होती हैं।

‘वैश्विक गाँव के इस युग में नेपाल में कम से कम दो गुप्तचर एजेंसियां जरूरी हैं,’ उन्होंने कहा।

बाहरी मामलों में छोटे-छोटे घटनाक्रम भी यहां प्रभाव डालते हैं। सामरिक महत्व के कारण भी बाहरी गुप्तचर आवश्यक है। फिलहाल बाहरी जानकारी के लिए मीडिया पर निर्भर रहना पड़ता है।

इतिहास से लेकर राजनीतिक स्वार्थ तक

२००७ साल से पहले भी गुप्तचर कार्य होते थे, लेकिन औपचारिक रूप से राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग की शुरुआत २००८ साल में हुई। उस समय यह विभाग केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो के नाम से जाना जाता था।

२०१२ में पुलिस अधिनियम के बाद नेपाल पुलिस की औपचारिक स्थापना मानी जाती है। २००८ में यह विभाग केंद्रिय ब्यूरो के रूप में था, जो बाद में पुलिस विभाग में शामिल हो गया।

पुलिस मुख्यालय

२०७२ में छह साल के पुलिस विवाद के बाद २०७३ में गुप्तचर को पुनः पुलिस से अलग कर नेपाल गुप्तचर विभाग नाम दिया गया और स्वतंत्र एजेंसी बनाया गया। इसमें कुछ पुलिस अधिकारी भी शामिल किए गए थे।

लेकिन २०७५ में इसे फिर से पुलिस मुख्यालय के अंतर्गत लाया गया।

२०८० में पुलिस से अलग कर गृह मंत्रालय के अधीन रखा गया। इस दौरान सेवा, शर्तें और नियम पुलिस सेवाओं के समान थे।

२०४० में इसका नाम बदलकर नेपाल जनसंपर्क प्रधान कार्यालय बनाने का प्रयास हुआ। (क) आंतरिक और (ख) बाहरी जासूसी में विभाजित था।

राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग

२०४२ में राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग नाम दिया गया और विशेष सेवा अधिनियम के जरिए इसे अधिक व्यवस्थित किया गया।

यह विभाग अब भी उसी नाम से पहचानता है और २०४६ के बाद से आंतरिक गुप्तचर का कार्य कर रहा है। इस समय बाहरी गुप्तचर तंत्र मौजूद नहीं है।

२०४६ में गृह मंत्री योगराज उपाध्याय ने ‘प्रत्यक्ष प्रजातंत्र के बाद बाहरी गुप्तचर जरूरी नहीं’ कह कर बाहरी गुप्तचर हटा दिया था।

ओली–वामदेव का गुप्तचर में हस्तक्षेप

राजनीतिक स्वार्थ के लिए गुप्तचर विभाग को बार-बार स्थानांतरित और दुरुपयोग किया गया है।

२०५१ का चुनाव बाद नेकपा एमाले सबसे बड़ी पार्टी बनी और मनमोहन अधिकारी प्रधानमंत्री, केपी शर्मा ओली गृह मंत्री थे। २०५२ में उन्होंने पुलिस डीआईजी गोविन्द कर्म थापालाई गुप्तचर प्रमुख नियुक्त किया।

थापालाई उस समय कम योग्यता माना गया, लेकिन ओली ने प्रतिशोध की राजनीति के तहत उन्हें गुप्तचर प्रमुख बनाया। विष्णुराज पन्त को सेवा निवृत्त कर इस नियुक्ति को राजनीतिक प्रतिशोध माना जाता है।

वामदेव गौतम

ओली की यह गुप्तचर नियुक्ति के बाद वामदेव गौतम ने २०५३ में पुनः हस्तक्षेप किया और नेपाल पुलिस के आईजीपी अच्युतकृष्ण खरेल को गुप्तचर प्रमुख बनाना चाहा।

खरेल ३६ दिन में हट गए और गुप्तचर प्रमुख पद से हटाए गए। तब के प्रधानमंत्री राजपाका लोकेंद्रबहादुर चन्द थे।

गृह मंत्री वामदेव गौतम के नेतृत्व में खरेल नियुक्त हुए, जबकि कायम प्रमुख हरिबहादुर चौधरी कार्यकारी थे।

गुप्तचर प्रमुखों की नियुक्ति में इस अस्थिरता ने साफ़ कर दिया कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए दुरुपयोग और प्रतिशोध की वजह से गुप्तचर प्रमुखों को बदला जाता रहा है।

जवाफ लेख्नुहोस्

तपाईँको इमेल ठेगाना प्रकाशित गरिने छैन। अनिवार्य फिल्डहरूमा * चिन्ह लगाइएको छ