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नेपाल बार एसोसिएसन ने रास्वपा सांसद बास्कोटा और न्यौपाने के वक्तव्यों को संसदीय अभिलेख से हटाने की मांग की

नेपाल बार एसोसिएसन ने रास्वपा सांसद समीक्षा बास्कोटा और यणमणि न्यौपाने के वक्तव्यों को संसदीय अभिलेख से हटाने की मांग की है। बार की आकस्मिक बैठक ने सांसदों के बीच हुई अभिव्यक्तियों को हटाने और ऐसी घटनाओं को दोहराए जाने से रोकने के लिए सभामुख को स्पष्ट निर्देश देने का आग्रह किया है। सांसद बास्कोटा ने सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीशों को कपड़े खोलकर राजनीति करने की चुनौती दी है और न्यायिक कार्यों में विचलन न होने का अनुरोध किया है। ४ जेठ, काठमाडौं।

सोमवार दोपहर हुई बार की आकस्मिक बैठक में सांसद बास्कोटा और न्यौपाने के वक्तव्यों को हटाने के लिए आग्रह करने का निर्णय लिया गया, इसकी जानकारी महासचिव केदार प्रसाद कोइरालाले पत्रकार सम्मेलन में दी। संविधान की धारा १०५ में अदालत में विचाराधीन मामलों पर संसद में चर्चा प्रतिबंधित है, फिर भी आज संसद में खुले तौर पर इस विषय पर चर्चा होना अत्यंत दुखद बताया गया है।

विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘आवेग और दंभ पर आधारित अशिष्ट अभिव्यक्तियों के अंत और पश्चाताप में नेपाल बार एसोसिएसन स्पष्ट है। ऐसे वक्तव्यों को संसदीय अभिलेख से हटाने तथा पुनः ऐसी घटनाओं के न दोहराए जाने के लिए सम्माननीय सभामुख से अनुरोध करता है।’ सोमवार को प्रतिनिधि सभा की बैठक में सांसद बास्कोटा और न्यौपाने ने न्यायाधीशों के संबंध में आलोचना की थी।

कार्यवाहक (कामु) प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल ने संवैधानिक परिषद के निर्णय के खिलाफ दायर रिट दायर करने के आदेश सोमवार को दिया था। इस आदेश के विरोध में रास्वपा सांसद बास्कोटा और न्यौपाने ने संसद में आपत्ति जताई। संविधान की धारा १०५ के अनुसार, अदालत में विचाराधीन मामले पर बहस प्रतिबंधित है। ‘नेपाल के किसी भी अदालत में विचाराधीन मामले से जुड़े न्याय कार्य पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाले विषय तथा न्यायाधीशों द्वारा किए गए न्यायिक कार्यों पर संघीय संसद के किसी भी सदन में चर्चा नहीं की जाएगी’ उल्लेख है। लेकिन सांसद बास्कोटा ने इस प्रावधान का उल्लंघन करते हुए सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीशों को अपनी कोट खोलकर राजनीति करने की चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीशों का मुख्य दायित्व न्याय प्रदान करना है और अन्य विषयों में हस्तक्षेप न करने का आग्रह किया है।

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