
‘कक्रोच जनता पार्टी बदली हुई युग की नई भाषा है’
समाचार संक्षेप
संपादकीय रूप में समीक्षा।
- भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेरोज़गार युवाओं को काकरोच से तुलना की टिप्पणी की, जिसके बाद सोशल मीडिया पर ‘कक्रोच जनता पार्टी’ नामक एक ऑनलाइन आंदोलन शुरू हो गया।
- राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कक्रोच जनता पार्टी को केवल मजाक न मानते हुए इसे व्यवस्था में बेचैनी और विद्रोह का संकेत बताया है।
- सीजेपी पर प्रतिबंध ने सरकार की तानाशाही प्रवृत्ति को उजागर किया है और यह युवाओं की निराशा और आशा का मिश्रण है, जैसा यादव ने बताया है।
8 जेठ, काठमांडू। भारतीय राजनीति को एक नया प्रतीक मिल गया है: काकरोच या साङ्लो। पिछले हफ्ते भारतीय प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी के बाद यह विषय चर्चा में आ गया। सुनवाई के दौरान, उन्होंने पत्रकारिता और सामाजिक सक्रियता में लगे बेरोज़गार युवाओं की काकरोच और परजीवी से तुलना की बात कही।
बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी यह टिप्पणी विशेष रूप से नकली और आधारहीन डिग्री वाले लोगों के लिए थी, सभी युवाओं के लिए नहीं।
फिर भी यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गई और गुस्सा व व्यंग्य के साथ ‘कक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी)’ नामक एक मजेदार राजनीतिक अवधारणा बन गई। यह पार्टी कोई औपचारिक राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि राजनीतिक व्यंग्य आधारित ऑनलाइन आंदोलन है।
इसकी सदस्यता के मानदंडों में बेरोज़गार होना, आलसी होना, हमेशा ऑनलाइन सक्रिय रहना और ‘पेशेवर तरीके से अपनी भड़ास निकालने की क्षमता’ होना शामिल है।
पांच दिनों में ही इंस्टाग्राम पर एक करोड़ 70 लाख से अधिक फॉलोअर्स एकत्रित हो गए हैं। इस आंदोलन की रचना राजनीतिक संचार विशेषज्ञ व बोस्टन विश्वविद्यालय के छात्र अभिजीत दीपक ने की है।
अभिजीत के अनुसार यह केवल एक मजाक के तौर पर शुरू हुआ था। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव इसे मात्र मज़ाक न मानते हुए गहरा सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का संकेत मानते हैं।
‘तानाशाह सरकारें चुटकुलों से डरती हैं’
योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘कक्रोच जनता पार्टी सोशल मीडिया पर एक मिम के रूप में शुरू हुई, लेकिन यह केवल हंसी और मजाक नहीं है। यह व्यवस्था के स्थापित रास्ते बंद होने के कारण नीचे उठी बेचैनी और विद्रोह है।’
उन्होंने आगे कहा, ‘मजाक और चुटकुले हमेशा किसी न किसी गहरे दर्द से जुड़े होते हैं। सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाना राजनीतिक रूप से गंभीर संकेत है।’
यादव के अनुसार, जब कोई सरकार सत्ता सख्त कर देती है, विद्रोह अप्रत्याशित जगहों से उठता है।
‘1971 में इंदिरा गांधी की बड़ी जीत के बाद 1974 में जयप्रकाश आंदोलन आया, 1980 में राजीव गांधी की सफलता के बाद 1983 में असम आंदोलन शुरू हुआ, 2009 की सफलता के बाद 2011 में अन्ना आंदोलन और 2019 के बाद किसान आंदोलन हुए। जब व्यवस्था के रास्ते बंद होते हैं, जनता नए रास्ते खोजती है।’
सीजेपी के पूर्व हैंडल पर प्रतिबंध के बाद यादव कहते हैं, ‘तानाशाही सरकार चुटकुलों से सबसे ज्यादा डरती है। जो चुटकुले नहीं सुन सकता, वह खुद चुटकुला बन जाता है। प्रतिबंध ने गुस्सा कम किया है, पर अब यह बहुत दूर जाएगा।’
वे विपक्ष के लिए भी चेतावनी देते हैं कि युवाओं के बड़े हिस्से ने इस मिम अकाउंट को फॉलो किया है, इसलिए विपक्ष उनका आकर्षक विकल्प नहीं बना सका है। नेताओं को युवाओं तक पहुंचना चाहिए।
पर सवाल अब भी है: क्या यह केवल सोशल मीडिया पर गुस्सा व्यक्त करने का माध्यम है और जमीन पर कोई बदलाव नहीं होगा? यादव कहते हैं:
‘यह बदले हुए युग की नई भाषा है। मेरे समय में लोग घोषणापत्र पढ़ते थे, आज लोग यूट्यूब देखते हैं। पहले पोस्टर बनाते थे, अब मिम्स बनाते हैं। हमें हर पीढ़ी की नई भाषा सीखनी होगी।’
यादव ने कहा, ‘प्रतिबंध न लगाया जाता तो गुस्सा खत्म हो जाता, लेकिन अब जब इसकी अभिव्यक्ति रोकी गई है, तो यह गंभीर विषय हो गया है।’
‘पहले चुटकुले हमारे बीच थे, अब सरकार भी चुटकुलों का हिस्सा बन गई है। अब सरकार पर चुटकुलों की तलवार सी लगी है और यह मामला और आगे जा सकता है।’
बदला हुआ युग की भाषा
इस अकाउंट से लोग तेजी से जुड़ रहे हैं और गंभीर राजनीतिक मुद्दे भी उभर रहे हैं। आने वाले दिनों में इसका क्या रूप होगा, देखना बाकी है।
यादव कहते हैं, ‘प्रतिबंध हटाने की मांग तेज होगी। यह सिर्फ इतने बड़े फॉलोअर्स वाले अकाउंट की आवाज नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आवाज होगी।’
उन्होंने कहा, ‘मैं सोच रहा हूं कि सरकार इस प्रतिबंध को कैसे न्यायसंगत ठहराएगी। कुछ तो जमीन के नीचे चल रहा है। इसकी अभिव्यक्ति कैसी होगी, हमें पता नहीं, लेकिन सरकार एक बड़ा जोखिम ले रही है।’

सीजेपी विषय पर कई मिम्स बन रहे हैं। क्या मिम्स घोषणापत्र की जगह ले रहे हैं या यह युवा घोषणापत्र बन सकता है? यादव कहते हैं:
‘यह बदले हुए युग की नई भाषा है। पहले घोषणापत्र पढ़ते थे, आज यूट्यूब देखते हैं। पहले पोस्टर बनाते थे, अब मिम्स बनाते हैं। इस व्यंग्य के पीछे गहरा राजनीतिक संदेश है। यदि सत्ता में बैठे और विपक्षी दोनों इससे नहीं सीखते, तो वे अपनी जमीन खो देंगे।’
अगर भारतीय युवा खुद को कक्रोच से जोड़ रहे हैं, तो क्या यह केवल आक्रोश है या लोकतांत्रिक व्यवस्था में गहरी निराशा भी है? यादव कहते हैं:
‘हाँ, निराशा और गुस्सा है, लेकिन साथ ही आशा और आकांक्षा भी है। वे चाहते हैं कि कोई आए और उनका सहारा बने। यह सिर्फ नकारात्मक नहीं है, इसमें एक उम्मीद भी है।’
(बीबीसी हिन्दी से)