एन्फा निलंबन: दोषी कौन हैं और निलंबन खत्म करने के उपाय क्या हैं?
तस्वीर स्रोत, NSC
नेपाली फुटबॉल इस समय इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है।
विश्व फुटबॉल महासंघ (फीफा) द्वारा निलंबन के कारण अंतरराष्ट्रीय खेलकूद के दरवाजे बंद हो गए हैं। फीफा से मिलने वाला आर्थिक सहयोग भी ठप हो गया है। खिलाड़ी निराश हैं।
इसी बीच खेलकूद गतिविधियां कम होने के कारण खिलाड़ियों के पलायन की समस्या बढ़ रही है, जिससे देश में ही भविष्य बनाने वाले खिलाड़ियों में अनिश्चितता बढ़ी है।
युवा केंद्रित दो परियोजनाएं ठप हैं। क्लब चैंपियनशिप में खेलने से खिलाड़ियों को वंचित किया गया है। निलंबन तक यह स्थिति बनी रहेगी।
इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन हैं? यह महत्वपूर्ण सवाल उठ रहा है और विशेषज्ञ याद करते हैं कि हालात से उबरने और निलंबन खत्म कराने के लिए जल्दी समाधान खोजना आवश्यक है।
अखिल नेपाल फुटबॉल संघ (एन्फा) और नेपाली फुटबॉल निलंबित होने में तीन पक्ष जिम्मेदार माने जाते हैं।
पहला एन्फा के पदाधिकारी हैं, दूसरा एन्फा विरोधी पक्षधर और तीसरा राष्ट्रीय खेलकूद परिषद यानी नेपाल सरकार।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये जिम्मेदार निकाय समाधान खोजने वाले भी हैं।
सबसे पहले दोषी कौन हैं, इस पर चर्चा करते हैं।
एन्फा नेतृत्व पर उठे सवाल
एन्फा निलंबन का जिम्मा अखिल नेपाल फुटबॉल संघ के सभी पदाधिकारियों पर माना जा रहा है।
मुख्य रूप से अध्यक्ष पंंकजविक्रम नेम्वाङ और महासचिव किरण राई को दोषी ठहराने वाले ज्यादा हैं।
कई एन्फा अधिकारियों ने नेम्वाङ और राई की ‘मनमानी’ का आरोप लगाकर अविश्वास प्रस्ताव भी दिया है।
कुछ का मानना है कि अध्यक्ष नेम्वाङ ने एन्फा संचालन में संतुलित राजनीति करने की कोशिश नहीं की।
चार साल पहले अध्यक्ष बनने में अहम भूमिका निभाने वाले साथियों को धीरे-धीरे हटाने के कारण एन्फा में शक्ति संतुलन बिगड़ा है।
इसके बाद नेम्वाङ के लिए एन्फा चलाना कठिन होता गया।
दूसरे दोषी वे एन्फा पदाधिकारी हैं जो हमेशा दो धड़ों में बंटकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ पूरे करते रहे हैं। तीसरे दोषी जिला और क्लब के पदाधिकारी भी हैं।
एन्फा पर सवाल उठने पर ये पदाधिकारी आम सभाओं में भी मुख नहीं खोलते और नेतृत्व को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देते रहे हैं।
विपक्षी पक्षधर
दूसरी नजर से देखें तो एन्फा के काम में बाधा डालने वाले सभी विपक्षी पक्षधर निलंबन के दोषी माने जाते हैं।
एन्फा चुनाव में हारने वाले पूर्व अध्यक्ष कर्मा छिरिंग शेर्पा और अन्य पराजित सदस्यों ने एन्फा को सुचारू रूप से काम करने नहीं दिया।
वे विभिन्न मुद्दों पर बाधा उत्पन्न कर रहे थे। विजयी पदाधिकारी भी एन्फा नेतृत्व का सहयोग नहीं कर पाए जिसकी वजह से समस्या बढ़ी।
जानकार मानते हैं कि इन सबका गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार समस्या का मूल कारण है।
राष्ट्रीय खेलकूद परिषद (राखेप)
राखेप ने खेलकूद विकास ऐन २०७७ के तहत एन्फा को चुनाव कराने निर्देशित किया, लेकिन एन्फा ने इसका पालन नहीं किया।
राखेप फीफा द्वारा निलंबन की चेतावनी को नजरअंदाज कर रहा था और अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था।
राखेप ने एन्फा के केंद्रीय पदाधिकारियों पर विदेश जाने पर प्रतिबंध लगाकर उन्हें काला सूची में भी डाला।
समय से पहले चुनाव और तहगत निर्वाचन विवाद
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एन्फा की सबसे बड़ी समस्या ‘अर्ली इलेक्सन’ की घोषणा और तहगत निर्वाचन का अस्वीकार है, जो डीपी प्रमुख ने उजागर किया है।
एन्फा ने फीफा और एशियाई फुटबॉल महासंघ (एएफसी) की मदद से अर्ली इलेक्सन का रास्ता अपनाया।
लेकिन राखेप ने देश के कानून के अनुसार जिला स्तर से तहगत निर्वाचन करने का निर्देश दिया।
एन्फा विधान में तहगत निर्वाचन का उल्लेख नहीं होने का हवाला देते हुए यथास्थिति में चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
सरकार के निर्देश न मानने और फीफा से निलंबन की धमकी के कारण हस्तक्षेप रोका गया।
तहगत निर्वाचन बिना समय से पहले चुनाव करवाना एन्फा की गलती साबित हुई।
निलंबन स्वीकार करते हुए भी तहगत चुनाव प्रक्रिया को एन्फा ने स्वीकार नहीं किया।
अड़चन बनी समस्या
राखेप की धारणा साफ है – चुनाव कराओ, लेकिन देश के कानून के तहत तहगत तरीके से।
एन्फा का कहना है – विधान में तहगत चुनाव की कल्पना नहीं है। फीफा स्वीकृत चुनाव ही मान्य होगा।
फीफा का कहना है – एन्फा में तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। ऐसा होने से निलंबन हुआ।
पंंकज नेम्वाङ के नेतृत्व में चार वर्षों में सभी पक्षों के रुख ने नेपाली फुटबॉल को निलंबन की अवस्था तक पहुंचा दिया, कहते हैं विशेषज्ञ।
समाधान क्या है?
राखेप फीफा को पत्र लिख कर तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप न करने की गारंटी देता है तो एन्फा का निलंबन आसानी से खत्म हो सकता है।
इसके बाद एन्फा राखेप की शर्तें मानते हुए तहगत निर्वाचन प्रक्रिया स्वीकार कर समस्या का समाधान हो सकता है।
राखेप अगर फीफा से बातचीत कर मनाने में सफल होता है और सभी समस्याएं समाधान की दिशा में आगे बढ़ती हैं तो निकास निकल सकता है।
गुजरे असार ६ को एन्फा का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। इसलिए फीफा अगर सभी पक्षों को शामिल करते हुए ‘नॉर्मलाइजेशन कमिटी’ बनाता है और आगे बढ़ने की सहमति देता है तो स्थायी समाधान संभव है।
नॉर्मलाइजेशन कमिटी निर्धारित समय में एन्फा के विधान में बदलाव, खेलकूद विकास ऐन २०७७ में संशोधन और नई चुनाव प्रक्रिया के माहौल तैयार करने से स्थायी समाधान आ सकता है।
यदि यह काम शीघ्र पूरा हो जाता है तो नेपाली खिलाड़ी जल्द ही फुटबॉल खेल पाएंगे।