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बालेन सरकार की विदेश नीति: ‘पुराना बोझ’ न उठाने का क्या मतलब है?

विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने बीबीसी को दिए गए इंटरव्यू में बताया कि ‘पुराना बोझ’ से उनका तात्पर्य पार्टीगत और व्यक्तिगत स्वार्थों पर आधारित फैसलों से है। उन्होंने कहा कि वे पड़ोसी देशों के साथ इतिहास में मौजूदा विवादों को समाप्त करने के पक्ष में हैं। कूटनीतिक रिश्तों को पुराने दोषों और कठोर फैसलों से मुक्त रखकर नई शुरुआत करने की बात सत्ता में गठित दल के अध्यक्ष ने सार्वजनिक रूप से कही है, जिससे इस विषय को स्पष्ट करना आवश्यक हो गया है, ऐसा विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है।

वालेन्द्र शाह ‘बालेन’ के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद से ही विदेश मंत्री ने दिल्ली और बीजिंग का दौरा कर सरकार की प्राथमिकताएं तय की हैं। इस दौरान कुछ शीर्ष अमेरिकी अधिकारी भी नई सरकार के साथ सहयोग के अवसरों पर चर्चा के लिए काठमांडू आए। सरकार ने “विकास कूटनीति” को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन इन दौरों से अपेक्षित परिणाम न मिलने पर कुछ विदेश नीति विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।

विदेश मंत्री खनाल ने कहा, “नेपाल की कूटनीति और विदेशी संबंधों में विशेष रूप से हमने जिस बात पर आलोचनात्मक नजर रखी, वह थी कि ये संबंध ज्यादा व्यक्तिगत और दलगत थे।” उन्होंने आगे कहा, “हम उन संबंधों की परवाह नहीं करते जो दल, व्यक्ति या पात्र अपने या दल के स्वार्थ के लिए बनाते हैं। हम वह बोझ नहीं उठाना चाहते।” पिछले महीने दिल्ली यात्रा के दौरान राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने ने नेपाल-भारत संबंधों को नई शुरुआत देने के अवसर पर चर्चा की थी।

विदेश मंत्री खनाल के अनुसार, भारत और चीन के दौरों में विकास सहयोग, ऊर्जा, संपर्क नेटवर्क और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में बातचीत हुई है। उन्होंने कहा, “नेपाल सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता में विशेष रूप से एक चीन नीति को उच्च प्राथमिकता दी है और नेपाल के भूभाग का चीन-विरोधी गतिविधियों के लिए उपयोग नहीं होने पर हम स्पष्ट हैं।” चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने मंत्री खनाल से मुलाकात के दौरान कहा था, ‘दूर के रिश्तेदार से अच्छा है नज़दीकी पड़ोसी’।

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