
पृथ्वी का औसत तापमान ने कायम किया नया रिकॉर्ड, अगस्त महीना अब तक का सबसे गर्म महीना
२५ भाद्र, काठमांडू। यूरोपीय संघ (ईयू) की जलवायु निगरानी संस्था ने गुरुवार को एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार अगस्त महीना वैश्विक स्तर पर अब तक का सबसे गर्म महीना साबित हुआ है। इसी अवधि में महासागर के तापमान में भी अत्यधिक वृद्धि दर्ज की गई है। पश्चिमी यूरोप ने इस वर्ष की सबसे गर्म गर्मी का सामना किया है।
कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के इस मूल्यांकन पर संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी जारी की है। मानव जाति जीवाश्म ईंधन के उपयोग को समाप्त नहीं करेगी तो पृथ्वी और अधिक संकट में फंस जाएगी।
कोपरनिकस के रिकॉर्ड १९४० तक सीमित हैं। लेकिन आइस कोर, वृक्ष के छल्ले और कोरल कंकाल जैसे अन्य प्रमाण वैज्ञानिकों की मदद करते हैं। इस हिसाब से आज के जलवायु को प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भों से तुलना करना आसान हो गया है।
यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट की सामन्था बर्गेस ने कहा, ‘मानवों ने पिछले १ लाख वर्षों में आज जैसा तापमान कभी नहीं देखा।’ कोपरनिकस के मुताबिक अगस्त में विश्व का औसत वायु तापमान १६.९६ डिग्री सेल्सियस था। यह जुलाई २०२३ के पिछले रिकॉर्ड से ०.०१ डिग्री सेल्सियस अधिक है। इतने मामूली अंतर के कारण कोपरनिकस ने दोनों महीनों को संयुक्त रूप से सबसे गर्म माना है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि मानव गतिविधियों ने पृथ्वी को गर्म किया है। विशेषकर कोयला, तेल और गैस जलाने से पूर्व-औद्योगिक युग के बाद से पृथ्वी का तापमान लगभग १.४ डिग्री बढ़ गया है। इससे चरम मौसम की तीव्रता और संभावना भी बढ़ गई है। हालांकि वर्ष २०२५ में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन अपने नए उच्च स्तर पर पहुंच चुका है।
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टिल ने कोपरनिकस की रिपोर्ट पर कहा, ‘प्रमाण अटल हैं। यह मानव जाति के जीवाश्म ईंधन उपयोग और उससे उत्पन्न वैश्विक जलवायु संकट की कीमत है।’
विश्व के समुद्री सतह का तापमान भी नया दैनिक रिकॉर्ड तोड़ चुका है। यह अगस्त माह का तापमान अब तक का सबसे गर्म स्तर है। यह विश्व के महासागरों में पिछले तीन महीनों से लगातार नए रिकॉर्ड बनाने की प्रक्रिया जारी है।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से उत्पन्न ९० प्रतिशत से अधिक गर्मी महासागर अवशोषित कर रहे हैं। इससे धरती की गर्मी कम हो रही है। लेकिन इसका गंभीर प्रभाव समुद्री जीवन, मूंगे की चट्टानों और तटीय क्षेत्रों पर पड़ा है।
अटलांटिक, भूमध्यसागर और उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर जैसे अत्यधिक गर्म क्षेत्रों ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में आधुनिक युग का सबसे शक्तिशाली एल नीनो मौसमी प्रणाली तेजी से मजबूत हो रही है।
इन घटनाओं में प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म होता है। इसका दूर-दराज के क्षेत्रों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। जिसके कारण पेरू में बाढ़, अफ्रीका में सूखा और ऑस्ट्रेलिया में जंगल की आग जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
प्राकृतिक जलवायु चक्र के गर्म चरण एल नीनो से विश्वव्यापी तापमान में अस्थायी वृद्धि होती है। जबकि दीर्घकालिक तापमान वृद्धि पहले ही अधिक हो चुकी होती है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में तापमान के और नए रिकॉर्ड टूटेंगे। यह ‘सुपर’ एल नीनो दिसंबर के आसपास अत्यंत तेज हो सकता है। जिससे २०२६ और २०२७ सबसे गर्म वर्ष बन सकते हैं।
इम्पीरियल कॉलेज लंदन की जलवायु वैज्ञानिक फ्रेडरिक ओटो ने कहा, ‘जलवायु परिवर्तन हर एल नीनो को और भी गर्म बनाता है। जब तक हम कोयला, तेल और गैस का उपयोग बंद नहीं करेंगे, तब तक ये रिकॉर्ड तोड़ने वाले महीने बार-बार आएंगे।’
कोपरनिकस के अनुसार अगस्त माह ने पश्चिमी यूरोप की सबसे गर्म गर्मियों का अंत किया है। इसने २००३ के पुराने रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। तब अगस्त तक निरंतर भयंकर गर्मी चली थी, जिसने स्कूल बंद करवा दिए, नदियां सुखा दीं और धरती पर आग फैला दी।
जुलाई के मध्य से अगस्त के मध्य तक यूरोप की यूरोमोमो निगरानी प्रणाली ने भारी नुकसान का आकलन किया है। इसके अनुसार यूरोप में ३२ हजार से अधिक अतिरिक्त मौतें हुई हैं।
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन नेटवर्क के वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि उस समय चली गर्म हवा जलवायु परिवर्तन के बिना संभव नहीं थी।
लेकिन यह असाधारण गर्मी विश्व के विभिन्न हिस्सों में व्यापक रूप से महसूस की गई थी। बुधवार को नेशनल ओसीनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन ने जानकारी दी कि अमेरिका ने अपनी इतिहास की सबसे गर्म गर्मी का अनुभव किया है।
कोपरनिकस के आंकड़ों के अनुसार लगभग ९० करोड़ लोग रहने वाले क्षेत्रों ने अब तक की सबसे गर्म जुलाई का सामना किया है। आईसीएमडब्ल्यूएफ की महासागर वैज्ञानिक सामन्था बर्गेस ने कहा, ‘हमने केवल यूरोप ही नहीं, विश्व के अन्य हिस्सों में भी असाधारण गर्मी देखी है। वहां लगभग शताब्दी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए गए हैं।’
उन्होंने आगे कहा, ‘अगर हम वैश्विक उत्सर्जन को रोकते नहीं हैं, तो जलवायु और भी चरम रूप लेगी।’