
अरुण तेस्रो जलविद्युत् आयोजना: बाँध निर्माण ८०% पूरा, प्रसारण लाइन में समस्याएँ
समाचार सारांश
संखुवासभा में निर्माणाधीन ९०० मेगावाट क्षमता वाले अरुण तेस्रो जलविद्युत् आयोजनाके बाँध निर्माण कार्य ८० प्रतिशत से अधिक पूरा हो चुका है। प्रसारण लाइन विस्तार में स्थानीय विवाद, ऐलानी जमीन की प्राप्ति और कानूनी जटिलताओं के कारण कार्य प्रभावित हुआ है, ऐसा ऊर्जा मंत्रालय ने बताया। नेपाल को इस आयोजन से २१.९ प्रतिशत अर्थात् १९७.१ मेगावाट विद्युत् नि:शुल्क प्राप्त होगी और २५ साल बाद यह आयोजन नेपाल सरकार को हस्तांतरित कर दिया जाएगा।
१० साउन, काठमांडू। संखुवासभा में निर्माणाधीन ९०० मेगावाट क्षमता वाले अरुण तेस्रो जलविद्युत् आयोजनाके बाँध निर्माण कार्य ८० प्रतिशत से अधिक पूरा हो चुका है। आयोजनाकी कुल भौतिक प्रगति संतोषजनक रहते हुए भी उत्पादन विद्युत् को राष्ट्रीय प्रसारण नेटवर्क से जोड़ने वाली लाइन निर्माण में कानूनी और स्थानीय समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। ऊर्जा, जलस्रोत तथा सिंचाई मंत्रालय के सहायक प्रवक्ता शालीग्राम भण्डारी के अनुसार, जलविद्युत् आयोजनाका निर्माण तीव्र गति से हो रहा है लेकिन प्रसारण लाइन विस्तार में स्थानीय अवरोध, ऐलानी जमीन की प्राप्ति और जमीन सीमा से संबंधित कानूनी जटिलताओं के कारण कार्य प्रभावित हुआ है।
‘प्रसारण लाइन के अंतर्गत आईई तथा राइट ऑफ वे (आरओडब्ल्यू) से जुड़े विवाद अभी समाधान के अधीन हैं,’ उन्होंने कहा, ‘ढल्केबर–सीतामढ़ी प्रसारण लाइन के भारत की तरफ लगभग १.८ किलोमीटर हिस्से का निर्माण पूरा हो चुका है, लेकिन नेपाल की तरफ राइट ऑफ वे की समस्याओं के कारण कार्य आगे नहीं बढ़ पाया है।’ उनके अनुसार २२० केवी प्रसारण लाइन के लिए दोनों तरफ ३०-३० मीटर क्षेत्र की आवश्यकता होती है और उक्त क्षेत्र में ही मुआवजा १० से २० प्रतिशत तक ही दिया जाता है, जिसके कारण स्थानीय लोगों से सहमति बनाना कठिन साबित हो रहा है।
इन समस्याओं के समाधान के लिए मंत्रालय, नेपाल विद्युत् प्राधिकरण और संबंधित निकायों द्वारा समन्वित प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार ने अरुण तेस्रो आयोजन से उत्पन्न विद्युत् को भारत को निर्यात करने हेतु ढल्केबर–सीतामढ़ी ४०० केवी अंतरराष्ट्रीय प्रसारण लाइन निर्माण को प्राथमिकता दी है। गत असार ३१ को पोखरा में सम्पन्न नेपाल–भारत ऊर्जा सचिवस्तरीय संयुक्त निर्देशन समिति की १३वीं बैठक में इस प्रसारण लाइन के माध्यम से आयात क्षमता को १ हजार मेगावाट से बढ़ाकर १ हजार ४०० मेगावाट और निर्यात क्षमता को १ हजार १०० मेगावाट से बढ़ाकर १ हजार ६५० मेगावाट करने पर सहमति हुई थी।