
नेपाल वायुसेवा निगम में सर्वोच्च अदालत का महत्वपूर्ण फैसला
सर्वोच्च अदालत ने नेपाल वायुसेवा निगम के कार्यकारी अध्यक्ष एवं महाप्रबंधक के रूप में 80 वर्षीय महेश्वरभक्त श्रेष्ठ की नियुक्ति को प्रथम दृष्टया गैरकानूनी करार दिया है। अदालत ने 30 असार 2083 को मंत्रिपरिषद के निर्णय को मापदंड और निगम की कार्यविधि के विपरीत मानते हुए उक्त नियुक्ति को रद्द करने का आदेश जारी किया है। संचालक उपेन्द्रबहादुर कार्की ने स्वयं को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए जाने की मांग की थी, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने इसे कानूनी मान्यता नहीं दी। 5 भाद्र, काठमांडू।
सर्वोच्च अदालत ने 80 वर्ष की आयु के व्यक्ति को नेपाल वायुसेवा निगम के कार्यकारी अध्यक्ष तथा महाप्रबंधक पद पर नियुक्त करने वाले सरकार के फैसले को गैरकानूनी बताया है। सरकार ने 30 असार 2083 को महेश्वरभक्त श्रेष्ठ को उक्त पद पर नियुक्त किया था। नियुक्ति गैरकानूनी ठहराए जाने के बाद उन्हें बर्खास्त किया गया, जिसके खिलाफ उपेन्द्रबहादुर कार्की ने सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर की थी।
गुरुवार को इस याचिका की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश सुनिलकुमार पोखरेल और बालकृष्ण ढकाल की संयुक्त पीठ ने श्रेष्ठ की नियुक्ति को सरकार के मापदंड और निगम की कार्यविधि के खिलाफ पाया। नेपाल सरकार के सार्वजनिक निकायों में पदाधिकारियों एवं सदस्यों की नियुक्ति से संबंधित मापदंड, 2073 के धारा 3(घ) के अनुसार, कार्यकारी प्रमुख पद के लिए आयु कम से कम 30 वर्ष पूरी कर 65 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए और पदाधिकारी के लिए न्यूनतम 35 वर्ष की आयु आवश्यक है।
सर्वोच्च का आदेश बताता है, “मापदंड और कार्यविधि के अनुसार महाप्रबंधक पद के लिए 65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति की नियुक्ति निषिद्ध है। नियुक्ति के समय महेश्वरभक्त श्रेष्ठ की आयु 80 वर्ष थी, जो नियुक्ति त्रुटिपूर्ण साबित करती है।” महेश्वरभक्त श्रेष्ठ को महाप्रबंधक की जिम्मेदारी समेत कार्यकारी अध्यक्ष पद पर नियुक्त करने का मंत्रिपरिषद का निर्णय कानूनी नहीं था, इसलिए अदालत ने उक्त नियुक्ति रद्द करने का आदेश दिया है।