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भोटेकोशी प्रलय की पूर्वसूचना देने वाली रिपोर्ट अगर खजाने में न पड़ी होती तो क्या होता…

समाचार सारांश

  • २४ असार २०८२ की सुबह रसुवा में भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ में १८ नागरिक लापता हुए और मितेरी पुल सहित कस्टम यार्ड, कंटेनर, वाहन व सड़क खंड को नुकसान हुआ।
  • गत वर्ष हुई रसुवा बाढ़ के बाद बनाई गई रिपोर्ट ने ग्लेशियर झील, नदी किनारे की आबादी, पूर्वसूचना प्रणाली और जोखिम मूल्यांकन हेतु वैज्ञानिक अध्ययन करने की सलाह दी थी।
  • रिपोर्ट की सिफारिशें और निष्कर्ष लागू नहीं किए गए और दराज में रखे गए; एक वर्ष के भीतर इसी तरह की बड़ी बाढ़ फिर से आई।

१६ भाद्र, काठमांडू। २४ असार २०८२ को सुबह ३ बजे रसुवा में नेपाल-चीन अंतरराष्ट्रीय सीमा से होकर बहने वाली भोटेकोशी नदी (चीन की ओर से इसे ल्हेन्दे खोला कहा जाता है) में अचानक बाढ़ आ गई।

इस बाढ़ में १८ नागरिक लापता हो गए। मितेरी पुल बह गया, इसके साथ ही रसुवागढ़ी जलविद्युत परियोजना, रसुवा कस्टम कार्यालय का यार्ड, जांच-पास पर रखे मालवाहक कंटेनर, वाहन और स्याफ्रुबेसी–रसुवागढ़ी सड़क खंड को भी भारी नुकसान हुआ।

इसी बाढ़ के बाद रसुवा में हुए नुकसान का प्रारंभिक विवरण संकलित करने और शीघ्र रिपोर्ट बनाने के उद्देश्य से जिला सुरक्षा समिति रसुवा और जिला प्रबंधन समिति रसुवा की आकस्मिक बैठक में एक समिति गठित की गई।

समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट आज भी सरकारी दस्तावेज में दर्ज है। लेकिन, रिपोर्ट की सिफारिशें व निष्कर्ष कार्यान्वयन में नहीं आए। बल्कि यह रिपोर्ट दराज में पड़ी रही।

इसके बाद ठीक एक वर्ष के भीतर इसी प्रकार की, लेकिन उससे कहीं बड़ी क्षमता वाली बाढ़ दुबारा आई और अभूतपूर्व मानवीय नुकसान हुआ।

प्रतिनिधि सभा की विकास समिति के अध्यक्ष और नेपाल इंटरमोडल विकास समिति के तत्कालीन कार्यकारी निर्देशक आशिष गजुरेल बताते हैं, ‘पिछली साल की बाढ़ ने कस्टम बिंदु के साथ आसपास की आबादी को कड़ी चेतावनी दी थी, शायद हम इसे गंभीरता से नहीं ले सके।’

रिपोर्ट में क्या कहा गया था?

इस रिपोर्ट ने इस बाढ़ की प्रकृति को देखते हुए नदी किनारों पर बसे इलाकों और संरचनाओं के निर्माण के दौरान अचानक आई ऐसी बाढ़ की संभावना को ध्यान में रखना ज़रूरी बताया था।

‘ग्लेशियर झील, सुप्राग्लेशियल झील, जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, हिम पिघलने की प्रक्रिया की तीव्रता, अतिवृष्टि, नदी के आसपास बड़े भू-स्खलन के कारण होने वाली बाढ़ से जन-धन की सुरक्षा के लिए संभव हो सके आधुनिक तकनीक और सावधानी अपनाना आवश्यक लगता है,’ रिपोर्ट में लिखा है।

रिपोर्ट ने प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व जानकारी के लिए जरूरी तकनीक, संरचना और पूर्वसूचना प्रणाली विकसित कर भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पूर्वसंधान योग्य बनाने पर ज़ोर दिया था ताकि जन-धन के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके।

अंतरराष्ट्रीय पूर्वसूचना प्रणाली से लेकर बस्तियों के जोखिम मूल्यांकन तक

रिपोर्ट ने चीन और नेपाल के सीमा क्षेत्र में स्थित ग्लेशियर झीलों और नदियों के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय पूर्वसूचना प्रणाली स्थापित करने के लिए सहयोग करने का सुझाव दिया था।

यह प्रणाली बाढ़, ग्लेशियर झील फटने या अन्य संभावित आपदाओं की पूर्व सूचना देकर जन-धन के नुकसान को कम कर सकती है, यह रिपोर्ट का सुझाव था।

रिपोर्ट ने भोटेकोशी नदी और इसकी सहायक नदियों के दोनों किनारे स्थित ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक नक्शांकन, निगरानी और जोखिम मूल्यांकन करने का सुझाव दिया।

उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न संभावित ग्लेशियर लेक आउटब्रस्ट फ्लड (GLOF) कम करने के लिए दीर्घकालीन योजना (जैसे पानी निकास संरचना, निगरानी उपकरण) स्थापित करने और निर्माण करने की भी सलाह दी गई थी।

नदी किनारे की संरचनाएं और बस्तियों में जलवायु जोखिम का मूल्यांकन करें

रिपोर्ट ने दीर्घकालीन जोखिम कम करने हेतु नदी किनारे किसी भी संरचना, योजना या बस्ती के निर्माण से पहले जलवायु परिवर्तन, हिमबाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से आने वाले जोखिम का वैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य करने की नीति अपनाने का आग्रह किया।

निर्माणाधीन और संचालित जलविद्युत परियोजनाओं से निकलने वाले वेस्ट मटीरियल को पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के अनुरूप अन्य क्षेत्र में जोखिम नहीं होने दें, यह भी रिपोर्ट ने सुझाया।

सूखे बंदरगाहों पर संभावित जोखिम का मूल्यांकन करें

रिपोर्ट ने चीन सरकार की सहायता से विकसित होने वाले उत्तर दिशा के व्यापार मार्ग स्याफ्रुबेसी–रसुवागढ़ी सड़क को सुधारने हेतु पहल करने का भी सुझाव दिया था।

साथ ही उस क्षेत्र में निर्माणाधीन रसुवागढ़ी के बाढ़ बाद के हालात का विश्लेषण कर विस्तृत भूगर्भीय और पूर्वाधार अध्ययन कर संभावित जोखिम का आकलन कराने की सलाह दी गई तथा अध्ययन के आधार पर ही पुनर्निर्माण शुरू करने का सुझाव दिया।

टिमुरे से बेत्रावती तक की बस्तियों को स्थानांतरित करने की योजना बनाएं और लागू करें

रिपोर्ट ने उन बस्तियों के स्थानांतरण की योजना बनाने और उसे लागू करने की सलाह दी जो वर्तमान बाढ़ के बाद उजड़ गई हैं।

रसुवागढ़ी से बेत्रावती तक नदी किनारे टिमुरे, स्याफ्रुबेसी, मैलुङ, पैरेबेसी, शांतिबजार, खाल्टे आदि बस्तियाँ बाढ़ के उच्च जोखिम में हैं, यह रिपोर्ट में भी उजागर किया गया।

उन बस्तियों का वैज्ञानिक अध्ययन कर प्राथमिकता के अनुसार सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरण योजना बनाकर उसे लागू करने पर जोर दिया।

आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाएं, नदी किनारे पूर्वसूचना प्रणाली रखें

पिछली वर्ष की बाढ़ के बाद सरकारी निकायों की बनाई रिपोर्ट में कहा गया कि विपद प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन, सुरक्षा निकाय, संबंधित कार्यालय, स्थानीय तह और समुदाय की क्षमता बढ़ाकर संसाधन सुदृढ़ करें।

नदी किनारे की बस्तियों व संरचनाओं में साइरन लगाने, मोबाइल संदेश, एफएम रेडियो आदि माध्यम से पूर्वसूचना प्रणाली स्थापित करने की भी सलाह दी गई। रिपोर्ट में विपद न्यूनीकरण को विकास निर्माण योजनाओं में अनिवार्य करने का सुझाव भी था।

साथ ही छोटे व्यवसायी और कृषकों के लिए सरकारी सहायता से बाढ़, भू-स्खलन, हिमबाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का बीमा करवाने का भी प्रस्ताव रखा गया।

सरकार ने खुद बनाए इस रिपोर्ट के सुझावों को एक साल तक दराज में रखा, लेकिन उन सुझावों पर अमल नहीं किया। इसके बजाय इस नदी प्रणाली के आसपास लगातार संरचनाएं बनती रहीं और मानवीय गतिविधियां जारी रहीं। जिसका परिणाम अब भोटेकोशी बाढ़ के रूप में सामने आया है।

पिछले साल साउन में सरकार को सौंपी गई इस रिपोर्ट में लिखा है, ‘यदि ये सिफारिशें तत्काल और दीर्घकालीन दोनों दृष्टिकोण से लागू की जाएं, तो न सिर्फ रसुआी जिले, बल्कि पूरे हिमाली क्षेत्र में एक प्रभावी आपदा प्रबंधन प्रणाली बनने की संभावना है।’