
एक अंजुली जीवन
मबगेको नदी में एक अंजुली पानी चढ़ाए हो बाबा। आक्रोशित सी लग रही है नदी! पीड़ा और शर्मिंदगी की नदी मुझे घेर रही है। विस्मित होकर मैं सोच में डूबा हूँ, धरती को बर्दाश्त न होने योग्य मात्रा में उत्सर्जित गर्म गैसों के खिलाफ प्यासे नदी का विद्रोह था यह? या यह उसकी ममता भरी इच्छा थी कि वह मुझे अपने गर्भ में समाहित करे? मां के गर्भ में रहते हुए मैं पानी में था, वह पानी कितना गर्म और सुरक्षित था! उस पानी के अंदर मेरी छुपी-छुपाई दुनिया कितनी सुंदर और मधुर थी। मां के गर्भ से भी कठिन होता है नदी का गर्भाशय। अत्यधिक आक्रोश में वह मुझे दूरस्थ मंजिल की ओर फेंक रही है, क्रूर चट्टानों से टकराते और किनारे की विशाल दीवारों से भिड़ते हुए। मैंने जो गलती नहीं की उसका मुझे दंड भुगतना पड़ा! जीवन, आशा और उल्लास की नदी में। लेकिन आज, कीचड़ मिले पानी में बहते-बहते मैं थक चुका हूँ—तुमसे कितना दूर? इतने दूर इस समय आना चाहिए था? मस्तिष्क में विचारों और विरोध की बुंदें नहीं आनी चाहिए थीं। मन के भीतर प्रश्नों की बाढ़ नहीं आनी चाहिए थी, बिल्कुल नदी से नहीं—‘मेरा क्या दोष था कि तुम मुझसे बदला ले रही हो?’ लेकिन मैं कैसे न पूछूं? ‘तुम मेरे निर्दोष पिता के दिल में छुरा क्यों घोंप रही हो और उनका प्राण क्यों छीन रही हो?’ ये सवाल मेरे हृदय में बह रहे हैं। तुमने बड़ी मेहनत से ओढ़ाई गई करुणा की धुंधली परत को भेदकर, कमजोर हुई आंखों से निकल रही हैं क्रोध की चिंगारियां। पहाड़ों को गिरने पर मजबूर करने वाले उन लालची दिमागों को, नदी की आवाज़ को दबाने वाले निर्दयी हाथों को, देशों को युद्ध में ले जाने वाले अहंकारी छातीओं को मैं लगातार प्रार्थना कर रहा हूँ—‘फिर से एक जीवन दो, हे माता!’ उस जन्म में पहाड़ को पिघलाने वाली गर्मी न हो, नदी को विषैले बनाने वाले हाथ न हों, आकाश को धुएं से ढकने का उद्देश्य न हो, और इंसान की जान से सत्ता की भूख बड़ी न हो।