
सख्ती बरतने कार्यालय प्रमुख का स्थानांतरण
सम्पादकीय सारांश
सम्पादकीय समीक्षा किया गया।
- पूर्वाधार विकास कार्यालय महोत्तरी ने २५ लाख रुपये तक के योजनाओं के काम को आगे बढ़ाने के लिए २४ उपभोक्ता समितियां गठित करने वाला पत्र सीधे वाडा कार्यालयों को भेजा है।
- कार्यालय प्रमुख कार्तिकेश झा ने पारदर्शिता बनाए रखते हुए कानून के अनुसार काम किया, जिसके कारण सांसदों और पूर्व मंत्रियों द्वारा धमकियाँ मिलती रहीं और अंत में उनका स्थानांतरण कर दिया गया।
- मधेश सरकार उपभोक्ता समितियों के माध्यम से काम कराने की प्रणाली को जारी रखते हुए कर्मचारियों पर दबाव डालने और स्थानांतरण करने की प्रवृत्ति दोहराती आ रही है।
२ वैशाख, जनकपुरधाम – पूर्वाधार विकास कार्यालय महोत्तरी ने कानूनी प्रक्रिया के तहत २५ लाख रुपये तक के योजनाओं के काम को आगे बढ़ाने के लिए २२ चैत को १५ पालिकाओं के सभी वाडा कार्यालयों को २५८ उपभोक्ता समितियां गठित करने का पत्र भेजा था। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कार्यालय ने सभी पत्र अपनी वेबसाइट पर भी प्रकाशित किया था।
पहले मधेश के भौतिक पूर्वाधार विकास मंत्रालय के अधीन कार्यालयों में मंत्री, सांसद, उनके नेता–कार्यकर्ता और दलाल अपने मनमाने तरीकों से उपभोक्ता समिति के पत्र प्राप्त करते थे। पिछले वर्ष इसी विषय पर वाडा अध्यक्षों ने तालाबंदी भी की थी।
इस बार कार्यालय ने नीति अपनाई कि पत्र सीधे वाडा कार्यालयों को भेजे जाएं और सभी को जानकारी के लिए वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाए। कार्यालय प्रमुख सीडीई कार्तिकेश झा के इस कदम से अन्य मंत्रालयों और अधीनस्थ निकायों में पारदर्शितापूर्वक काम करने का दबाव पैदा होने की उम्मीद थी।
लेकिन कुछ प्रदेश सांसद इससे असंतुष्ट थे। एक कर्मचारी के अनुसार कुछ सांसद और पूर्व मंत्री कार्यालय आए और पूछा कि उनके योजनाओं के पत्र क्यों वाडा में भेजे गए और वेबसाइट पर प्रकाशित किए गए। उन्होंने कहा कि ‘‘ऐसे पत्र हमें या हमारे लोगों को सीधे ही देने चाहिए, नहीं तो ठीक नहीं होगा’’ तथा स्थानांतरण की धमकी दी।
स्थानांतरण के बावजूद कार्यालय प्रमुख झा ने कानूनी प्रक्रिया से हटने से इनकार किया, लेकिन अंत में मधेश प्रदेश सरकार ने उन्हें स्थानांतरित कर दिया। मुख्यमंत्री कार्यालय ने २५ फागुन को उन्हें प्रादेशिक तथा स्थानीय तह सुधार आयोजना, प्रादेशिक योजना कार्यान्वयन इकाई जनकपुर में भेजा।
कार्यालय के प्रवक्ता एवं उपसचिव रोहित कोइराला ने पुष्टि की कि सीडीई झा का कार्यभार सहित स्थानांतरण हुआ है। हालांकि झा ने स्थानांतरण के कारण के बारे में अनजान रहने की बात कही।
वे गत २७ असोज को महोत्तरी के पूर्वाधार कार्यालय आए थे। वे कहते हैं कि उन्होंने कानूनी तौर पर अपना कर्तव्य पूरा किया, तो क्यों स्थानांतरण हुआ, इसे वे नहीं जानते। ‘‘मुझे मौखिक जानकारी मिली है, लेकिन आधिकारिक पत्र अभी तक नहीं मिला। मैं नहीं समझता कि मैंने कोई गैरकानूनी काम किया है।’’
मुख्यमंत्री कार्यालय के एक कर्मचारी के अनुसार झा का स्थानांतरण इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने दबाव न मानते हुए कानून के अनुसार काम किया। ‘‘यहां अच्छे काम करने वाले नहीं, बल्कि नेतृत्व के दबाव में चलने वाले को ही सुविधा मिलती है। उपभोक्ता समितियों के माध्यम से कानून के तहत काम करवाना गलत नहीं है।’’
मधेश के भौतिक पूर्वाधार विकास मंत्री राजकुमार गुप्ता ने कहा कि कार्यालय प्रमुख झा का स्थानांतरण उनकी सहमति से हुआ है। ‘‘उन्हें प्रादेशिक तथा स्थानीय तह सुधार आयोजना में आवश्यकता थी, इसलिए सहमति से स्थानांतरण किया गया। कोई अन्य कारण नहीं है।’’
यह घटना उपभोक्ता समितियों के माध्यम से कानूनी काम करवाने के प्रयासों में हुई एक मामूली घटना मात्र है। कर्मचारी दबाव न मानने पर मुख्यमंत्री कार्यालय और मंत्रालय पुरानी पद्धति के तहत स्थानांतरण और मंत्रालय घसीटने की प्रवृत्ति दोहराते आ रहे हैं।
पिछले वर्ष जब योजना को टुकड़ों में बांटकर उपभोक्ता समितियों से काम नहीं करवाया गया, तब जनमत पार्टी के सतिश सिंह की सरकार ने मधेश के ऊर्जा, सिंचाई और पेयजल मंत्रालय के तत्कालीन सचिव जक्की अहमद अंसारी को २०८१ फागुन के पहले सप्ताह में मुख्यमंत्री कार्यालय में बुलाया था। इसी प्रकार मंत्री और सांसद की मर्जी के विपरीत उपभोक्ता समिति के पत्र वितरण में नम्रता न दिखाने पर पूर्वाधार विकास कार्यालय बारां के तत्कालीन प्रमुख ओम साह को भी मंत्रालय में ताना गया।
मधेश सरकार उपभोक्ता समितियों के माध्यम से काम अपने मुताबिक न होने पर कर्मचारियों पर दबाव डालने और स्थानांतरण करने की प्रवृत्ति दोहराती रही है। हालांकि उपभोक्ता समिति प्रणाली की आलोचना हो रही है, पर सरकार पर इसका खास प्रभाव नहीं पड़ा है। सभी दलों के सांसद भी इस प्रणाली को जारी रखने पर जोर देते हैं, क्योंकि इसके पीछे मुख्यमंत्री से लेकर सांसद तक के प्रत्यक्ष हित और लाभ जुड़े हैं।
इस बार भी योजनाओं के पत्र प्राप्त करने के लिए मधेश सरकार के अधीन कार्यालयों में सांसद, नेता, समर्थक और ठेकेदार की भीड़ देखी जा रही है।
नसच्चने की स्थिति में मधेश सरकार
स्थानीय संसाधनों और जनशक्ति के प्रयोग से गुणवत्ता, संरक्षण, संवर्द्धन और अपनत्व बढ़ाने की अवधारणा के अंतर्गत सरकार ने उपभोक्ता समितियों को एक करोड़ तक के काम को सार्वजनिक खरिद अधिनियम में शामिल किया है। पर मधेश में उपभोक्ता समिति गठन केवल कागजी होता है और भुगतान के लिए होता है।
कानूनी व्यवस्था के तहत उपभोक्ता समिति का गठन करने के लिए पत्र को सीधे वाडा कार्यालय भेजा जाता है, जहां सात दिन पहले सूचना प्रकाशित करनी होती है और योजना कार्यस्थल पर खुली बैठक कर समितियां बनानी होती हैं। पर व्यावहारिक रूप में मंत्री और सांसद स्वयं या अपने करीबी व्यक्तियों के जरिए कार्यालय से पत्र लेकर वाडा कार्यालय पहुंचते हैं, और वाडाध्यक्षों के साथ मिलकर उपभोक्ता समिति छिपकर बनाते हैं और काम टेंडर पर देते हैं।
इसके परिणामस्वरूप अपने कार्यकर्ताओं को मौका दिया जाता है और पत्र से कुछ प्रतिशत कमीशन के रूप में राशि लेने की प्रवृत्ति है। बजट बनाते समय भी कमीशन लेकर योजनाएं बनाई जाती हैं और दलालों का प्रवेश होता है, यह आरोप मधेश सरकार पर लगा है।
जनाधिकार आंदोलन और चुनाव के बाद सुधार की उम्मीद के बाबजूद मधेश सरकार पुरानी पद्धति पर कायम है। अब नेपाली कांग्रेस के कृष्णप्रसाद यादव के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार है और सभी दल और सांसद उपभोक्ता समितियों के माध्यम से कार्यान्वयन के पक्ष में हैं।
वित्तीय वर्ष २०८१/०८२ में जनमत के सतिशकुमार सिंह सरकार ने बजट वक्तव्य में खुली प्रतिस्पर्धा का उल्लेख करते हुए उपभोक्ता समितियों को हतोत्साहित करने का प्रयास किया, पर एमाले, कांग्रेस सहित अन्य दलों के दबाव में सरकार ने पीछे हटकर ५० लाख तक की योजनाओं को उपभोक्ता समितियों के द्वारा करने की मंजूरी दी। बाद में पत्र बिक्री और वितरण के विषय सामने आए और महोत्तरी, सर्लाही, सप्तरी जैसे जिलों में पूर्वाधार कार्यालयों में तालाबंदी हुई।
पूर्वाधार कार्यालय से वाडा कार्यालय तक पहुंचने वाले कई पत्र नेकपा एमाले संसदीय दल के नेता एवं तत्कालीन भौतिक पूर्वाधार विकास मंत्री सरोजकुमार यादव के सचिवालय के माध्यम से वितरित किए गए थे। इस विषय पर प्रदेशसभा में भी कड़ी बहस हुई थी।
मुख्य विपक्षी जसपा नेपाल और विपक्षी नेकपा माओवादी केन्द्र द्वारा दबाव डालने पर जेठ २२ को सभी दलों के प्रतिनिधि शामिल एक जांच समिति बनाई गई, लेकिन अब तक उसका रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुआ। उस वक्त विपक्ष में रहे दल अब भी सरकार में होने के बावजूद उपभोक्ता समितियों के काम करने के तरीके में खास बदलाव नहीं हुआ है।
अब भी मधेश प्रदेश सरकार ने २५ लाख तक के योजनाओं को उपभोक्ता समितियों के माध्यम से लागू करने का फैसला कर कार्यवाही शुरू कर दी है। अधिकांश योजनाएं इसी राशि तक की होती हैं।
इससे बजट बनाते समय दलालों का हावी होना, योजना निर्माण में कमीशन लेने और अन्य भ्रष्टाचार की जानकारी सड़क से सदन तक फैलती रही है। मधेश में अघोषित संसदीय विकास कोष के तहत सांसदों को बाँटी गई ५ करोड़ तक की योजनाएं भी उपभोक्ता समितियों के माध्यम से ही की जाती हैं, जिससे यह व्यवस्था लगातार जारी है।