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उचित व्यवस्थापनपछि मात्र बस्ती हटाउने सरकारी आश्वासन, ढुक्क छैनन् सुकुमवासी

उचित व्यवस्थापन के बाद ही बस्ती हटाने का सरकारी आश्वासन, सुकुमवासी अभी भी आश्वस्त नहीं

समाचार सारांश

  • सहरी विकास मंत्री सुनील लम्साल ने कहा कि सुकुमवासी लोगों की पहचान और प्रबंधन के बिना बस्ती खाली नहीं की जाएगी, हालांकि काठमांडू की बस्तियाँ डोजर से ध्वस्त की जा चुकी हैं।
  • गृह मंत्रालय ने अतिक्रमित भूमि की पहचान कर उचित प्रबंधन के बाद ही अतिक्रमण हटाने के लिए जिला प्रशासन को निर्देश दिया है।
  • भूमि समस्या समाधान आयोग के अनुसार देश में 12 लाख 9 हजार 545 भूमिहीन दलित और सुकुमवासी हैं, जिन्हें 13 जेठ तक लगत संकलन और प्रमाणीकरण करना आवश्यक है।

१८ वैशाख, काठमांडू। शहरी विकास मंत्री सुनील लम्साल ने गुरुवार कहा कि बाकी सुकुमवासी लोगों की पहचान और उचित प्रबंधन की व्यवस्था बनाये बिना बस्ती खाली करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी, लेकिन भूमिहीन लोग अभी भी आश्वस्त नहीं हो पाए हैं।

‘मेरा घर तो सरकार ने अगले ही दिन तोड़ दिया,’ शंखमुल की सुकुमवासी बस्ती में रहने वाले पवन गुरुङ कहते हैं, ‘सुकुमवासी की पहचान कर उचित प्रबंधन करके ही तोड़ने का आश्वासन सुना तो थोड़ी उम्मीद हुई थी, लेकिन आज दोपहर घर टूटने के बाद बेहोश सा हो गया।’

डोजर लगने के बाद गुरुङ, जो संयुक्त राष्ट्रीय सुकुमवासी मोर्चा के उपाध्यक्ष भी हैं, भक्तपुर के खरिपाटी स्थित विद्युत प्रशिक्षण केंद्र में शरण लेने गए।

दशरथ रंगशाला जाकर नाम दर्ज कराने के बाद लौटते हुए उन्होंने कहा, ‘५३ सालों से रहने वाला मेरा घर डोजर से तोड़ा जाना था, तो पहले हमें व्यवस्था करें, हमने यह कहा था, मगर किसी ने नहीं सुना। अपने ही आंखों के सामने घर गिरते देखकर वृद्धावस्था में भी आंसू रोक नहीं पाए।’

शुक्रवार दोपहर, जब रिपोर्टर शंखमुल पहुंचे, तब ५६ वर्षीया बालकृष्ण हुमागाईं की छोटी बेटी अपने सुनसान घर को देखकर रो रही थी। आसपास के सामुदायिक विद्यालय में कक्षा ६ में पढ़ने वाली वह बच्ची किताब भरा बैग लेकर जा रही थी।

बालकृष्ण की पत्नी के हाथ में एक सफेद कुत्ता था। लगभग १८ घंटे पहले सूचना मिलने के बाद उन्होंने घर का सामान छोड़कर कुत्ते को लेकर जाने की कोशिश कर रही थीं।

बालकृष्ण ने पत्नी को संबोधित करते हुए कहा, ‘कुत्ते से तो हम प्यार कर सकते हैं, हम इंसान हैं! बिना व्यवस्थापन के इस तरह बेघर नहीं किया जाना चाहिए।’

उन्होंने फेसबुक पर पढ़ा कि सरकार पहले व्यवस्थापन करेगी, इसलिए वे गुरुवार शाम को मान्छे चला कर रामेछाप के मन्थली गए थे। पत्नी ने फोन पर बताया कि ‘नगरपालिका ने माइकिंग की है’, इससे वे जल्दी सार्वजनिक बस पकड़कर घर लौट आए।

जब बालकृष्ण लौटे तो उनका छह वर्षों से रहने वाला पूरा घर खाली हो चुका था। छत और खिड़कियाँ सब ध्वस्त पड़ी थीं। डोजर आने वाला था।

उन्होंने कहा, ‘मेरे माता-पिता ने २०३३ साल में पाँच हजार रुपए में यह घर खरीदा था। वे यहीं बिताए। नौ सदस्यीय परिवार जिसमें चार पोते-पोतियाँ शामिल हैं, यहाँ रहते थे।’

दशरथ रंगशाला जाकर सुकुमवासी के नाम पर दर्जा कराने के बाद वह होल्डिंग सेंटर में कल बुलाए जाने की बात बताते हैं। उन्होंने बताया कि वे अपनी खंडहर जैसे घर के सामने मैदान में टेंट लगाकर एक रात बिताने की योजना बना रहे हैं। शुक्रवार रात वे परिवार सहित मंदिर के सामने मिले। उनकी बेटी मंदिर के अंदर थी।

अगर सरकार डोजर आने से पहले लगत संकलन, प्रमाणीकरण और व्यवस्थापन कर लेती, तो बालकृष्ण जैसे लोग घर टूटने के बाद भी टेंट में सोने के लिए विवश नहीं होते।

अतिक्रमित बस्तियाँ खाली करते समय उचित प्रबंधन की जिम्मेदारी पाने वाले केंद्रीय समन्वय समिति के संयोजक और शहरी विकास मंत्री सुनील लम्साल ने स्पष्ट किया है कि वर्षा ऋतु के दौरान बाढ़ के उच्च जोखिम वाली नदियों के किनारे की बस्तियों को मानवीय सुरक्षा के पहलू से ही खाली किया गया है।

मंत्री लम्साल की इस बात के दिन ही गृह मंत्रालय ने ७७ जिलों के प्रशासन कार्यालयों को पत्राचार करते हुए कहा कि ‘जिलों में मौजूद अतिक्रमित सरकारी और सार्वजनिक भूमि की पहचान कर उचित योजना के साथ संबंधित निकाय से मांग करके मंत्रालय को भेजा जाए और मंत्रालय की स्वीकृति के बाद ही अतिक्रमण हटाने के दौरान सुरक्षा और प्रबन्ध किया जाए।’

गृह मंत्रालय के प्रवक्ता आनन्द काफ्ले ने बताया कि सरकार ने योजनाबद्ध तरीके से अतिक्रमण हटाने के लिए यह परिपत्र जारी किया है।

गुरुवार को ही संघीय मामिला तथा सामान्य प्रशासन मंत्रालय ने ७५३ स्थानीय तह को पत्र लिखकर सुकुमवासी की पहचान, तत्काल अन्यत्र व्यवस्था करने की योजना बनाने और आवश्यक होने पर जिला प्रशासन से सहयोग लेने को कहा है।

गृह और संघीय मामिला मंत्रालय की लगत संकलन की तत्परता को सरोकार वाले सकारात्मक रूप में देख रहे हैं, परंतु आश्वस्त होने की स्थिति अब भी नहीं बनी है, ऐसा संयुक्त राष्ट्रीय सुकुमवासी मोर्चा के अध्यक्ष कुमार कार्की ने बताया। काठमांडू के बाहर दाङ, विराटनगर जैसे क्षेत्रों में बस्ती खाली करने की सूचना आने से वे लोग चिंतित हैं।

नेपाली सेना और नेपाल पुलिस द्वारा सुकुमवासियों से लगत संकलित करने के तथ्य सामने आने पर आलोचना हुई। कार्की कहते हैं, ‘सेना-पुलिस द्वारा तथ्यांक लेने पर आलोचना हुई, इसलिए मंत्रालय ने पत्र लिखा हो, ऐसा नहीं है। अगर वास्तव में उचित प्रबंधन कर काम आगे बढ़ेगा तो वह अच्छी बात है।’

काठमांडू जिला प्रशासन कार्यालय ने वैशाख १६ को बस्ती हटाने की सूचना जारी की थी। उसी के आधार पर शुक्रवार से बल्खु, बंशीघाट, शंखमुल सहित अन्य बस्तियों में डोजर लगाए जा रहे हैं।

काठमांडू के सहायक प्रमुख जिल्ला अधिकारी मुक्तिराम रिजाल ने कहा कि १६ तारीख की सूचना के बाद कोई अन्य निर्देश नहीं आया है। ‘हम १६ तारीख के निर्देशानुसार काम कर रहे हैं, अगर कोई नया आदेश आया तो मुझे जानकारी होगी या नहीं, यह अभी पता नहीं।’

बस्ती से लोगों को पहले आश्रय स्थल पर ले जाने के बाद वहां भोजन, जल और अन्य सुविधाएँ काठमांडू महानगरपालिकाको जिम्मेदारी हैं। महानगरपालिकाका प्रमुख अतिक्रमित बस्ती खाली कराने के दौरान व्यवस्थापन के लिए बने केंद्रीय समन्वय समिति के सदस्य हैं।

महानगरपालिकाका प्रवक्ता नवीन मानन्धर ने कहा कि बस्ती हटाने संबंधी कोई नया निर्णय उनके पास नहीं है, वे केंद्रीय समन्वय समिति के निर्देशानुसार अपना दायित्व निभा रहे हैं।

सरकार ने १३ चैत को स्वीकृत १०० बुँदे कार्यसूची के तहत १३ जेठ तक पूरे देश में भूमिहीन लोगों का लगत संकलन और प्रमाणीकरण पूरा करना आवश्यक बताया है।

भूमि समस्या समाधान आयोग के अनुसार देश में कुल १२ लाख ९ हजार ५४५ भूमिहीन दलित, भूमिहीन सुकुमवासी और अव्यवस्थित बसी-बस्ती हैं, जिनमें से ९८ हजार ५०२ भूमिहीन दलित और १ लाख ८० हजार २९३ भूमिहीन सुकुमवासी हैं।

सुकुमवासी मोर्चा के अध्यक्ष कार्की कम से कम वास्तविक भूमिहीन दलित और सुकुमवासी की पहचान कर ही अन्य कार्य करने का सुझाव देते हैं। वे कहते हैं, ‘यदि सरकार की स्पष्ट नीति होती तो देशभर के साथी को जवाब देना आसान होता।’

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