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संसद्‌मा खोजी भइरहँदा कहाँ थिए प्रधानमन्त्री बालेन ?

संसद में खोजी जारी, प्रधानमंत्री बालेन्द्र कहाँ थे?

प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह आर्थिक वर्ष २०८३/०८४ के नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा के दौरान गैरहाजिर रहने पर विपक्ष और सांसदों ने उनकी आलोचना की। वित्त मंत्री डा. स्वर्णिम वाग्ले ने प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में नीति तथा कार्यक्रम से जुड़े सवालों के जवाब दिए, लेकिन संसद का कक्ष खाली दिखा। संविधानविद डा. भीमार्जुन आचार्य ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री के संसद में उपस्थित होकर जवाब देना अनिवार्य है और यह संविधान का पालन करना है, कोई ऐच्छिक प्रक्रिया नहीं। ३१ वैशाख, काठमाडौं।

‘लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति’ – नेपाली कांग्रेस के नेता अर्जुननरसिंह केसी ने गुरुवार को आयोजित प्रतिनिधि सभा की बैठक में यह पंक्ति कहा, जिसका अर्थ है – ‘अगर आँखें नहीं हैं तो दर्पण (आईना) का क्या काम?’ यह वाक्य प्रधानमंत्री बालेन्द्र (बालेन) शाह की गैरहाजिरी में वित्त वर्ष २०८३/०४ के नीति तथा कार्यक्रम पर हुई चर्चा के विरोध में अनुभवी नेता केसी ने दिया। प्रधानमंत्री ने स्वयं जवाब देने के बजाय वित्त मंत्री को भेजा, जिस पर श्रम संस्कृति पार्टी के अध्यक्ष हर्कराज राई ने टिप्पणी की, “अपने ही विवाह में दूसरों को दूल्हा भेजना उचित नहीं।”

केवल प्रतिनिधि सभा में ही नहीं, राष्ट्रीय सभा में भी प्रधानमंत्री को खोजा गया। जनता समाजवादी पार्टी, नेपाल के संरक्षक महन्थ ठाकुर ने कहा, ‘‘असोजी बैठक में वह उपाएँ जैसा जल्दी-जल्दी कर रहे थे। टोपी पहने होते तो नजर नहीं आते। क्या वह वाकई पीएम थे? शायद नहीं, पर ऐसा लग रहा था।’’ वास्तव में, इस बार नीति तथा कार्यक्रम की तुलना में प्रधानमंत्री बालेन की संसद में अनुपस्थिति अधिक चर्चा में रही।

प्रतिनिधि सभा में अनुपस्थित प्रधानमंत्री शाह अपने आवास लौटे तब लगभग सात बज चुके थे। ३१ वैशाख को भी प्रधानमंत्री बैठक में उपस्थित नहीं हुए। अधिकांश समय उन्होंने सिंहदरबार स्थित प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद् कार्यालय में ही बिताया, सूत्रों ने बताया। प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वित्त मंत्री डा. स्वर्णिम वाग्ले ने नीति तथा कार्यक्रम से जुड़े प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रतिनिधि सभा नियमावली, २०७९ की नियम ३८ के अनुसार, नीति तथा कार्यक्रम से उठे प्रश्नों का जवाब प्रधानमंत्री या उनकी अनुपस्थिति में उनके द्वारा नियुक्त मंत्री के द्वारा दिया जाना चाहिए।

संविधानविद् डा. भीमार्जुन आचार्य ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री का संसद को न मानना अपने जन्मदाता को नज़रअंदाज़ करने के समान है। सदन में उपस्थिति, बोलना और जवाब देना कोई ऐच्छिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बाध्यकारी है।’’ इस विषय में जानकारों का कहना है कि चर्चा में भाग न लेना और सवालों के जवाब नहीं देना सरकार द्वारा अपने नीति तथा कार्यक्रम की स्वामित्व से इनकार करने के समान संदेश देता है।

कांग्रेस नेता अर्जुननरसिंह केसी द्वारा सदन में उद्धृत श्लोक अपूर्ण है। इससे पूर्व का वाक्यांश इस प्रकार है – ‘‘यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।’’ जिसके बाद आता है – ‘‘लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति।’’ अर्थात् जिसके पास स्वयं बुद्धि या विवेक नहीं है, उसके लिए शास्त्र भी कुछ नहीं कर सकता।

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