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‘म’ से ‘हम’ नहीं बन पाई महिला आन्दोलन

चाहे राजनीतिक कारण हो या अन्य, हालिया घटनाओं में ‘महिला समर्थक’ लोगों के साथ कुछ पुरुषों ने भी ‘महिला नियुक्ति’ संबंधी बात उठाई है। महिला आंदोलन के नेतृत्व करने वालों के केवल अपने और अपने आसपास के लोगों को देखने की प्रवृत्ति बढ़ने के कारण महिलावाद विरोधी आवाजें तेज हुई हैं। २००४ साल असार २२ गते काठमांडू के म्हैपी में हुई महिला सभा ने नेपाल महिला संघ की स्थापना की, जिसने महिलाओं को संगठित किया और राणाशासन के अंत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विश्व की चर्चा छोड़ दें, हमारे अपने देश और समाज की स्थिति देखने पर भी कुछ लोग आजकल महिलावाद आवश्यक नहीं मानते। यह महिलाओं के अधिकारों के लिए अच्छा संकेत नहीं है। लेकिन, जिन लोगों ने महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया है, उनकी स्वार्थ सिद्धि के लिए महिला आंदोलन को अपनी संकीर्ण द्रष्टि से केवल अपने और अपने निकट के हित में देखने के कारण यह स्थिति बनी है, ऐसी धारणा बढ़ रही है।

महिलावाद और महिलाओं के हितों के मुद्दों पर सदियों से संघर्ष जारी है; महिलाओं ने मतदान अधिकार और शिक्षा में समानता पाई है, फिर भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भेदभाव के विरोध की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। इसी तरह महिला आंदोलन के विरोध में भी आवाजें उठने लगी हैं। विश्व अध्ययन बताते हैं कि महिलाओं की सामूहिकता पर पहली पुस्तक १४०५ में इटली की क्रिस्टिन डे पिजान ने लिखी थी, जिसमें महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर चर्चा थी। उसके बाद फ्रांसीसी क्रांति में महिला श्रमिकों की बड़ी भागीदारी देखी गई। इतिहास बताता है कि समाज और देश की उन्नति में केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि कभी-कभी पुरुषों ने भी बड़ा योगदान दिया। लेकिन नेपाल में बड़े आंदोलनों में अक्सर कुछ लोग अपने योगदान को ही एकाकी प्रयास समझने लगते हैं।

संस्मरण और ऐतिहासिक लेखों में उस समय के महिला आंदोलन को सामूहिक नेतृत्व में चलने वाला स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए २००४ साल असार २२ गते काठमांडू के म्हैपी में हुई महिला सभा अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसने नेपाल महिला संघ की स्थापना की और महिलाओं को संगठित किया। कनाडा के प्रशिक्षक जॉन व्हाइटहेड ने नेतृत्व के तीन सिद्धांतों का उल्लेख किया है: द ग्रेट मैन थ्योरी, द ट्रेट थ्योरी और ट्रांसफॉर्मेशनल लीडरशिप। नेपाल के महिला आंदोलन को ट्रांसफॉर्मेशनल लीडरशिप की श्रेणी में रखा जा सकता है, जहाँ सभी पक्षों की महिला नेता सलाह और समन्वय करती थीं। प्रजा पञ्चायत काल में महिलाओं ने अपने मांगों के लिए दरबार में धरना दिया था, जिसने महिला शिक्षा के लिए ‘पद्मकन्या विद्याश्रम’ खोलने में मदद की।

वि.सं. २००४ में पहली बार स्थानीय निर्वाचन में जनता ने मतदान किया था लेकिन महिलाओं को मतदान करने के लिए २०१० साल तक इंतजार करना पड़ा, जो महिला अधिकारों के लिए एक बड़ा सक्रियता था। महिला अधिकार आंदोलन का समूह पर प्रभाव होने के कारण नेतृत्व में स्वार्थी प्रवृत्ति नकारात्मक मानी जाती है और इससे आंदोलन कमजोर होता है। हाल के प्रधान न्यायाधीश नियुक्ति प्रक्रिया में महिलाएं एकजुट नहीं हो पाईं, जो इसके उदाहरण हैं। देश की पहली महिला प्रधान न्यायाधीश और प्रधानमंत्री रह चुकीं सुशीला कार्की ने वर्तमान नियुक्ति को न्यायपालिका का संकुचन मानते हुए उसकी आलोचना की है। उन्होंने प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मलाल की उपेक्षा को ‘डेढ़ करोड़ महिलाओं पर लात प्रहार’ बताया। लेकिन इस टिप्पणी को खुले मंच पर ज्यादा समर्थन या प्रतिक्रिया नहीं मिली, जो यह दर्शाता है कि महिलाओं में भी आंदोलन के भीतर व्यक्तिगत स्वार्थ शामिल हैं, और केवल नेतृत्व के दलगत होना पर्याप्त नहीं है।

राजनीतिक स्वार्थ महिला नियुक्ति प्रक्रिया पर भी प्रभाव डालता है, और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति को लेकर पिछले २० वर्षों से सेटिंग की बातें चलती रही हैं। इससे देशभर में न्यायपालिका के प्रति असंतोष बढ़ा है और भविष्य में इसका क्या प्रभाव होगा, यह देखना होगा। फिर भी उम्मीद है कि नेपाल बार की बात के अनुसार न्याय पाने के लिए ‘‘लालटिन जलाकर’’ इंतजार नहीं करना पड़ेगा। नेपाल के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. शंकरकुमार श्रेष्ठ ने कहा कि केवल प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति से न्यायिक स्वतंत्रता फिर से हासिल नहीं हो सकती, न्यायपालिका की पुनर्संरचना आवश्यक है।

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