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शहर की महिलाएं ग्रामीण महिलाओं की तुलना में अधिक हिंसा की शिकार

महिला, कानून और विकास मंच ने नेपाल में गर्भावस्था, प्रसव और प्रसवोत्तर अवस्था में मौजूद महिलाओं द्वारा झेली गई दुर्व्यवहार और हिंसा के तथ्यों पर एक अध्ययन किया है। इस रिपोर्ट में परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं द्वारा महिलाओं को सहने पड़े दुर्व्यवहार और हिंसा की जानकारी दी गई है। काठमांडू, ९ वैशाख। सुरक्षित मातृत्व एवं प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार अधिनियम के तहत सम्मानजनक प्रसव सेवा की व्यवस्था होने के बावजूद गर्भवती अनेक महिलाएं अब भी दुर्व्यवहार और हिंसा के शिकार हो रही हैं, ऐसा अध्ययन में पाया गया है। महिला, कानून और विकास मंच (एफडब्लुएलडी) ने ‘नेपाल में गर्भावस्था, प्रसव और प्रसवोत्तर महिलाओं द्वारा झेली गई दुर्व्यवहार, हिंसा तथा अधिकार हनन सम्बन्धी तथ्य खोज’ शीर्षक से एक अनुसन्धान किया है। एफडब्लुएलडी ने बुधवार को इस अध्ययन की रिपोर्ट सार्वजनिक की। गर्भवती, प्रसव और प्रसवोत्तर अवस्थाओं में एक तिहाई से अधिक महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ा है, ऐसा अध्ययन दर्शाता है। अधिकांश गृहिणियों में हिंसा अधिक पाई गई, साथ ही परिवार के सदस्य, रिश्तेदार, पड़ोसी और पति हिंसक पाए गए हैं, यह जानकारी एफडब्लुएलडी के अधिवक्ता दीपेश श्रेष्ठ ने दी।

अध्ययन के अनुसार गर्भवती महिलाओं तथा स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं द्वारा भी दुर्व्यवहार और हिंसा के मामले सामने आए हैं। इसके अतिरिक्त, भावनात्मक, शारीरिक और यौन हिंसा में से भावनात्मक हिंसा का सर्वाधिक प्रकोप देखा गया है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों की महिलाएं अधिक हिंसा की शिकार पाई गई हैं। मधेश की गर्भवती और सुदूरपश्चिमी क्षेत्रों की प्रसव एवं प्रसवोत्तर महिलाएं अधिक भावनात्मक हिंसा सहन कर रही हैं, यह तथ्य खोज में उल्लेख हुआ है। महानगरपालिका, उपमहानगरपालिका, नगरपालिका और गाउँपालिका क्षेत्रों में निवास करने वाली ५६० गर्भवती, ५६० प्रसव करने वाली और ५६० प्रसवोत्तर महिलाएं सहित कुल १,६८० महिलाओं पर तथ्य खोज की गई है, जानकरी श्रेष्ठ ने दी। यह अध्ययन सात प्रदेशों के १४ जिलों के २८ पालिकाओं में किया गया था। प्रत्येक पालिका से ६० महिलाएं अध्ययन में शामिल थीं, जिनमें २० गर्भवती, २० जन्म के बाद ४२ दिनों के भीतर प्रसव करने वाली और २० जन्म के ४२ दिन से ३ महीने तक की प्रसवोत्तर महिलाएं थीं। अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार ३८.४ प्रतिशत गर्भवती, ३७.९ प्रतिशत प्रसव कर चुकी महिलाओं और ३५.९ प्रतिशत प्रसवोत्तर महिलाओं ने हिंसा झेली है। ३०.७ प्रतिशत गर्भवती, ३२.७ प्रतिशत प्रसवकालीन और ३० प्रतिशत प्रसवोत्तर महिलाओं को भावनात्मक हिंसा का सामना करना पड़ा है, यह अध्ययन पुष्ट करता है।

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