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नई सरकार ने बदनाम तरीके को बढ़ावा दिया

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा के बाद तैयार।

  • सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष के लिए विभिन्न शीर्षकों पर 90 अरब 30 करोड़ 95 लाख रुपये अबंडा बजट आवंटित किया है।
  • वित्त मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत इस बड़े आकार के अबंडा बजट ने खर्च के दुरुपयोग और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. पुष्पराज कँडेल ने इस प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए कहा कि यह बजट को स्वार्थ के अनुसार खर्च करने का प्रयास है।

15 असार, काठमांडू। आवंटन विधेयक की मंत्रालयगत चर्चा के दौरान डेढ़ सप्ताह पहले विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार मंत्री महावीर पुन ने संसद में एक खुलासा किया।

उनके अनुसार मंत्री बनने से पहले उन्हें ‘अबंडा’ शब्द का अर्थ नहीं पता था, जो बिना बजट शीर्षक के एकमुश्त राशि रखे जाने को कहते हैं। लेकिन कुल बजट का 1 प्रतिशत से अधिक राशि अबंडा के रूप में आवंटित कर मंत्री का पद दिया गया, जबकि कोई कार्यक्रम नहीं मिला। मंत्री पुन के अनुसार विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा नवाचार मंत्रालय को साढ़े 3 करोड़ रुपये का अबंडा बजट दिया गया है।

यह मंत्रालय बिल्कुल नया नहीं है। मंत्री के अनुसार यह मंत्रालय सातवीं बार पुनः स्थापित किया गया है। नवाचार नाम आने से पूर्व यह पूर्ण मंत्रालय था जो बजट लेकर कार्यक्रम संचालित करता था। लेकिन इस बार सरकार ने पुन पर बड़ा विश्वास जताते हुए साढ़े 3 करोड़ रुपये अबंडा बजट में आवंटित किया है, जिससे उन्हें खर्च करने की स्वतंत्रता मिली है।

सरकार आकस्मिक खर्च के लिए कुछ राशि अबंडा में रखती है, सामान्यतः अधिकांश बजट खर्च योग्य शीर्षकों में बांटा जाता है।

लेकिन अबंडा बजट में खर्च योग्य शीर्षक नहीं होते और वित्त मंत्रालय आवश्यकतानुसार खर्च शीर्षकों में ब्रेकडाउन करके पैसे खर्च करता है। इससे त्वरित खर्च में बड़ी राशि रखकर सार्वजनिक वित्त में गलत उदाहरण बनता है।

पिछले वर्षों से कुल बजट का लगभग 5 प्रतिशत राशि अबंडा में रखी जाती है। इस वित्तीय वर्ष में 78 अरब बजट अबंडा था, जबकि आगामी वर्ष के लिए 90 अरब आवंटित किया गया है। पूर्व सचिव के अनुसार राजनेता अपनी योजनाओं को बजट में शामिल करवाने के लिए तथा पर्याप्त अध्ययन न होने के कारण शीर्षक नहीं भेद पाते इस कारण अबंडा बजट रखे जाते हैं।

अबंडा बजट अधिक रखनें को वित्तीय अनुशासन के हिसाब से गलत माना जाता है। एक अन्य पूर्व सहसचिव के अनुसार अबंडा बजट कहाँ खर्च होगा पता नहीं चलता, न कार्यक्रम बनते हैं और न ही लागत का हिसाब होता है।

डीपीआर नहीं बनी परियोजनाओं के बजट अबंडा में रखे जाते हैं और आगे जरूरत के मुताबिक विभिन्न खर्च शीर्षकों से अन्य मंत्रालयों को वितरित किया जाता है।

इस बार वित्त मंत्रालय ने सबसे बड़ा अबंडा बजट रखा है। आगामी आर्थिक वर्ष के व्यय अनुमान विवरण (लाल किताब) के अनुसार वित्त मंत्रालय ने विभिन्न शीर्षकों में 90 अरब 30 करोड़ 95 लाख बजट रखे हैं।

यह अबंडा बजट चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान से भी बड़ा है। संशोधित अनुमान के अनुसार चालू वर्ष में 8 अरब 77 करोड़ 71 लाख रुपये खर्च होने की अपेक्षा है।

इस बार संसद में विपक्ष की आवाज कमजोर है। पर कुछ सत्तारूढ़ दल के सदस्य जैसे बदनकुमार भंडारी ने भी अबंडा में रखे गए बड़े बजट को पारदर्शिता पर सवाल उठाने वाला बताया है।

संसद में प्रश्नों के उत्तर में वित्त मंत्री डा. स्वर्णिम वाग्ले ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। उन्होंने पारंपरिक उत्तर देते हुए आकस्मिकता और नए मंत्रालयों में विस्तृत कार्यक्रम तैयार न होने के कारण ज्यादा राशि अबंडा में रखनी पड़ी दलील दी।

मंत्रियों ने सांसदों को कहा है: “यदि कोई कार्यक्रम छूट गया हो तो मंत्रालय आएं, उसे संबोधित किया जाएगा।” पूर्वाधार विकास मंत्री सुनिल लम्साल ने यह बात कई बार दोहराई। वित्त मंत्री वाग्ले ने भी सांसदों को संबोधित करने का आश्वासन दिया है।

इससे स्पष्ट होता है कि सरकार पर्याप्त राशि अबंडा बजट में रखकर स्वेच्छा से योजना लागू करने की स्थिति में है, जो राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एवं सांसद डॉ. पुष्पराज कँडेल की भी राय है। उन्होंने कहा, “वित्त मंत्रालय अकेले 8 खरब के करीब बजट खर्च कर रहा है, और अतिरिक्त 90 अरब अबंडा बजट भी है। यह प्रवृत्ति बजट को स्वार्थानुसार खर्च करने की कोशिश है।”

वित्त मंत्रालय अबंडा बजट कहां खर्च करता है?

लाल किताब के अनुसार वित्त मंत्रालय ने विभिन्न मदों में आवंटित बजट से प्रमुख रूप से खास व्यक्तियों के भ्रमण खर्च के लिए 10 करोड़ रुपये रखे हैं, जबकि चालू वर्ष में ऐसा खर्च 7 करोड़ रुपये था।

प्रतिनिधि मंडल भ्रमण और स्वागत खर्च में 17 करोड़ रुपये आवंटित हैं। बड़े मुआवज़े के लिए 8 अरब रुपये का बजट रखा गया है। कस्टम वापसी के लिए 20 करोड़ अलग रखे गए हैं।

आकस्मिक प्रशासन के लिए 38 अरब 1 करोड़ रुपये बजट रखा गया है, जिसे मंत्रालय अपने इच्छानुसार खर्च कर सकता है। आपदा, राहत और पुनर्स्थापन के लिए 18 अरब 79 करोड़ आवंटित हैं।

विकास कार्यक्रमों के लिए 19 अरब 23 करोड़ रुपये दिए गए हैं, जो वित्त मंत्रालय अपने अपने विवेक से खर्च कर सकता है। यह राशि पूंजीगत खर्च में भी जोड़ी जा सकती है।

पूंजीगत अधूरे परियोजनाओं के लिए केवल 4 अरब रुपये रखे गए हैं। पिछले वर्ष वित्त मंत्रालय ने गंडकी आर्थिक त्रिभुज परियोजना को अबंडा में रखा था, लेकिन चालू और आगामी वर्ष में इसका बजट जारी नहीं रहा।

संघीय सरकार ने अबंडा बजट के माध्यम से खर्च प्रवृत्ति को स्थापित किया है, जबकि प्रदेश और स्थानीय सरकारें भी इसे अपना रही हैं। महालेख की 63वीं रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय सरकारें हर वर्ष 6 अरब रुपये से अधिक अबंडा बजट रखकर खर्च कर रही हैं। महालेख यह प्रवृत्ति रोकने का सुझाव दे रहा है।

राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष कँडेल ने कहा कि बड़े अबंडा बजट से स्वार्थानुसार खर्च की प्रवृत्ति पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।

वित्त मंत्रालय के पूर्व सचिव का कहना है कि अबंडा में रखे गए बजट का जथाभावी और अपारदर्शी खर्च होना सही नहीं है।

उन्होंने कहा, “संसद में शीर्षक खोलकर बजट आवंटन विवरण प्रस्तुत करना अच्छा होता है। अबंडा बजट को कम करना चाहिए। बिना अध्ययन के परियोजनाओं को अबंडा में रखने की प्रवृत्ति को कम करना होगा, लेकिन अबंडा बजट खर्च भी प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिए। इसलिए बजट को भ्रष्टाचार नहीं मानना चाहिए।”

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